हस्तिनापुर का किला ढहा, इंद्रप्रस्थ की इंट्री
उत्तरांचल प्रेस क्लब चुनाव : सत्ता परिवर्तन की कहानी
देहरादून स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब के चुनाव में इस बार इतिहास रचा गया। वर्षों से एक गुट विशेष की जीत और लॉबिंग की राजनीति के बीच युवा वर्ग ने ऐसा जनादेश दिया, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। परिणाम साफ है—हस्तिनापुर का किला ढह चुका है और इंद्रप्रस्थ ने सत्ता में प्रवेश कर लिया है।
यह चुनाव केवल किसी एक मुद्दे—जैसे कुक—तक सीमित नहीं था। असल लड़ाई दो गुटों की सोच, कार्यशैली और भविष्य के विज़न के बीच थी। कुछ लोग खुलकर साथ थे, कुछ विरोधी खेमे में और कुछ तथाकथित स्पाई एजेंट बनकर अपनी भूमिका निभा रहे थे। बावजूद इसके, मतदाताओं ने स्पष्ट संदेश दिया।
तस्वीरें और नतीजे खुद गवाही दे रहे हैं कि वर्षों से अपनी “हुकूमत” का इक़बाल बुलंद रखने वाला बड़ा गुट इस बार पूरी तरह धराशायी हो गया। सभी पदों पर नई टीम की जीत ने यह साबित कर दिया कि उत्तरांचल प्रेस क्लब में अब जड़ों से बदलाव हो चुका है।
अध्यक्ष पद : आंदोलनकारी बनाम सत्ता समर्थक
इस चुनाव में “आंदोलनकारी बनाम मुलायम का सिपाही” का नारा सोशल मीडिया से लेकर मतदान केंद्र तक गूंजता रहा। नतीजा—अध्यक्ष पद पर अजय राणा की बड़े अंतर से जीत।
अजय राणा पहले भी अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके अनुभव और क्रांतिकारी विज़न से यह उम्मीद जगी है कि प्रेस क्लब आने वाले समय में नई योजनाओं और आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ेगा।
महामंत्री पद : तिलिस्म टूटा
महामंत्री पद पर युवा प्रत्याशी योगेश सेमवाल ने दमदार चुनाव लड़ते हुए अनिल चंदोला को बड़े अंतर से हराया। यह जीत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस तिलिस्म के टूटने की है, जिसे अजेय माना जा रहा था।
चार प्रत्याशियों के मैदान में होने से मत विभाजन जरूर हुआ, लेकिन मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से बदलाव के पक्ष में वोट दिया।
नई सुबह की शुरुआत
कुल मिलाकर, साल के अंतिम दिन उत्तरांचल प्रेस क्लब ने एक नई सुबह देखी। यह पहला चुनाव रहा, जहां “तिलिस्म” टूटने के साथ पूरी तरह नई कार्यकारिणी बनी।
पिछले चार-पांच वर्षों से मतदाताओं का बदला हुआ मिज़ाज अब निर्णायक रूप में सामने आया है। संघर्षों से उठी बदलाव की बयार मुकम्मल हो गई।
अब सवाल सिर्फ जीत का नहीं, बल्कि उस भरोसे को निभाने का है जो मतदाताओं ने नई टीम को सौंपा है।


