उत्तराखंड में गर्मी बढ़ने के साथ ही जंगल एक बार फिर आग की चपेट में आने लगे हैं। हर साल की तरह इस बार भी वन विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद जंगलों में आग की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि जंगलों में लगने वाली आग अब सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि मानव जीवन और आजीविका के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है।
प्रदेश में 15 फरवरी से अब तक वनाग्नि की 309 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 257 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा असर गढ़वाल मंडल में देखने को मिला है, जहां 227 घटनाओं में लगभग 185 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आए हैं। वहीं कुमाऊं मंडल में 50 घटनाओं में करीब 47 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
बृहस्पतिवार को भी चमोली, टिहरी समेत कई जिलों से जंगलों में आग लगने की खबरें सामने आई हैं। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक वनाग्नि की घटनाएं बद्रीनाथ वन प्रभाग में दर्ज की गई हैं, जहां 72 घटनाओं में 24 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। इसके अलावा रुद्रप्रयाग में 32, केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग में 31, पिथौरागढ़ में 29 और अलकनंदा वन प्रभाग में 21 घटनाएं सामने आई हैं।
हालांकि वन विभाग आग पर काबू पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन चुनौती यह भी है कि वनाग्नि की प्रतिदिन की सटीक रिपोर्ट समय पर तैयार नहीं हो पा रही है। मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन सुशांत पटनायक के अनुसार, आग लगने के उसी दिन यह स्पष्ट करना मुश्किल होता है कि कितनी घटनाओं में कितना क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
ऐसे में सवाल यही है कि आखिर हर साल धधकते जंगलों को बचाने के लिए स्थायी समाधान कब निकलेगा, क्योंकि जंगलों की आग अब पर्यावरण के साथ-साथ इंसानी जिंदगी के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

