देहरादून: कभी हरियाली और स्वच्छ हवा के लिए पहचानी जाने वाली दून घाटी अब तेजी से वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही है। हालात यह हैं कि देहरादून का AQI (Air Quality Index) कई दिनों से लगातार 300+ के खतरनाक स्तर को छू रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह श्रेणी “बहुत खराब (Very Poor)” से आगे बढ़कर स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक मानी जाती है, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और सांस के रोगियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है।
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि देहरादून की हवा में लगातार गिरावट ने अब इसे एक उभरते सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की दिशा में धकेल दिया है। जहां पहले दून घाटी को उत्तराखंड की “क्लीन एयर” राजधानी माना जाता था, वहीं अब धूल, धुएं और बढ़ते ट्रैफिक ने शहर की हवा को दमघोंटू बना दिया है।
AQI 300+ का मतलब स्वास्थ्य पर सीधा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक जब AQI 300 के ऊपर पहुंचता है, तो इसका असर केवल अस्थमा या एलर्जी तक सीमित नहीं रहता। ऐसी हवा में सांस लेने से आंखों में जलन और गले में खराश, सांस फूलना और खांसी, अस्थमा व ब्रोंकाइटिस के मरीजों की स्थिति बिगड़ना, बच्चों में फेफड़ों की क्षमता पर असर और लंबे समय में दिल और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का खतरा जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है।
प्रदूषण के प्रमुख कारण: धूल, ट्रैफिक और निर्माण गतिविधियां
देहरादून में बढ़ते AQI के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी, सड़कों पर उड़ती धूल (Road Dust), लगातार चल रहे निर्माण कार्य और मलबा, कूड़ा जलाने और खुले में धुआं और सर्दियों में मौसम की स्थिरता से प्रदूषण का फंसना जैसे कारण शामिल हैं। शहर में ट्रैफिक का दबाव बढ़ने के साथ-साथ पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था भी चुनौती बनी हुई है।
दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे: सुविधा या नई चुनौती?
देहरादून के लिए एक बड़ी परियोजना के रूप में चर्चित दिल्ली–देहरादून 2.5 घंटे एक्सप्रेसवे को लेकर भी नई चिंता सामने आ रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि एक्सप्रेसवे के चालू होने से देहरादून में वाहनों की आवाजाही बढ़ेगी, टूरिज्म और ट्रैफिक का दबाव तेज होगा, वाहन जनित प्रदूषण (Vehicular Pollution) बढ़ने की आशंका रहेगी और ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सरकार और प्रशासन अभी से प्रदूषण नियंत्रण की ठोस योजना तैयार करें, ताकि विकास के साथ पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
‘चुप रहना’ विकल्प नहीं, सिर्फ नारों से समाधान नहीं होगा
कई जागरूक नागरिकों का कहना है कि “देवभूमि में आपका स्वागत है” जैसे सामान्य वाक्यों के पीछे छिपकर इस समस्या को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है। देहरादून को बचाने के लिए जरूरी है कि प्रशासन समस्या को स्वीकार करे, वास्तविक आंकड़ों के साथ जनता को जागरूक करे और समाधान पर समूहिक कार्रवाई शुरू करे।
क्या हो सकते हैं समाधान?
विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार देहरादून में प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक साथ कई स्तरों पर काम करना होगा। सरकार और प्रशासन के स्तर पर सड़कों पर नियमित मैकेनिकल स्वीपिंग और वॉटर स्प्रिंकलिंग, निर्माण स्थलों पर डस्ट कंट्रोल नियमों का सख्त पालन, कूड़ा जलाने पर सख्त कार्रवाई करनी होगी। शहर में ग्रीन बेल्ट और शहरी वृक्षारोपण, ट्रैफिक मैनेजमेंट और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, व्यवसायों और संस्थानों के स्तर पर उद्योगों और निर्माण कंपनियों द्वारा प्रदूषण मानकों का पालन, ऑफिस/कॉर्पोरेट सेक्टर में कार पूलिंग और वर्क-फ्रॉम-होम विकल्प अपनाने होंगे। पर्यावरण अनुकूल प्रैक्टिस अपनाना, आम नागरिकों के स्तर पर निजी वाहन कम इस्तेमाल करने के साथ ही सार्वजनिक परिवहन/ई-वाहनों को बढ़ावा, खुले में कचरा जलाने से बचना, मास्क का उपयोग (विशेषकर AQI बहुत खराब होने पर) के साथ ही बच्चों और बुजुर्गों को सुबह-शाम बाहर निकलने में सावधानी बरतनी होगी।
आंकड़ा नहीं चेतावनी
देहरादून का AQI 300 के पार जाना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि चेतावनी है। यह संकेत है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो दून घाटी एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ सकती है। अब जरूरत है कि सरकार, प्रशासन, व्यवसाय और नागरिक—सभी मिलकर इस चुनौती को स्वीकार करें और लंबे समय तक चलने वाली रणनीति के साथ समाधान लागू करें।


