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Monday, August 8, 2022
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हरेला लोकपर्व जानिए जुड़ीं मान्यता

हरेला लोकपर्व जानिए जुड़ीं मान्यता Harela in Uttarakhand Traditional Festival Jee raye Jaagi raaye कुमायूँ का लोक पर्व ‘‘हरेला‘ हर साल जुलाई महीने में मनाया जाता है मान्यता है इस पर्व के दिन घरो में बोये गए हरेले को कटा जाता है जिसके बाद विधि विधान से पूजा पाठ करके घर के बड़े छोटे बच्चो को हरेला पूजते है धार्मिक महत्व को समेटे लोक पर्व ‘‘हरेला‘ कुमायु मंडल में मनाये जाने का एक विशेष महत्व घरो में साफ तरह से नज़र आता है चलिए जानते है इस पर्व की अनूठी वो बातें जो आपके लिए जरुरी है

चैत्र माह में – प्रथम दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है।
श्रावण माह में – सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है।आश्विन माह में – आश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है। चैत्र व आश्विन माह में बोया जाने वाला हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है। चैत्र माह में बोया/काटा जाने वाला हरेला गर्मी के आने की सूचना देता है,तो आश्विन माह की नवरात्रि में बोया जाने वाला हरेला सर्दी के आने की सूचना देता है।

श्रावण माह सावन में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से विशेष महत्व रखता है समूचे कुमाऊँ में विशेष लोक पर्व त्यौहारों में से एक माना जाता है। कुमायूँ मंडल में हरेला त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मान्यता है श्रावण सावन माह भगवान शिव भोलेशंकर का प्रिय महीना है, इसलिए हरेला कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि श्रावण माह शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण माह में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है।
धार्मिक पंडितो के अनुसार हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है। हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।

पर्यावरण को समर्पित लोक पर्व ‘‘हरेला‘‘ उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक है। यह पर्व हमें सम्पन्नता, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का भी सन्देश देता है। पर्यावरण संरक्षण तथा प्रकृति को महत्व देने की हमारी परम्परा रही है। उत्तराखंड में वन का 70 प्रतिशत भाग मौजूद है जो पूरे देश भर में अपना अलग महत्व रखता हैउत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का मानना है कि हरेला सुख-समृद्धि व जागरूकता का भी प्रतीक है। हमारी आने वाली पीढ़ी को शुद्ध वातावरण मिल सके इसके लिए सबको वृक्षारोपण व पर्यावरण संरक्षण के प्रति ध्यान देना होगा। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से आज दुनिया भर के देश चिंतित हैं। यह पर्व ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ने का भी संदेश देता है। मुख्यमंत्री कहते है हमें व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण के साथ उनके संरक्षण के प्रति भी ध्यान देना होगा।

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