उत्रराखंड में यहाँ दुल्हन की जगह देनी होती है दुल्हन

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देहरादून [भड़ास फॉर इंडिया]: आज के जमाने में जहां फेसबुक पर रिश्ते जुड़ने के साथ ही ऑनलाइन सादी भी हो जाती है, वहीं दूसरी ओर समाज में एक ऐसी बिरादरी भी है, जिसके रस्मोरिवाज खासतौर पर लड़के के विवाह को और जटिल बना देते हैं। यह बिरादरी है देहरादून जिले में जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर के गुर्जरों की, जिसमें साटा-पल्टा (दुल्हन लेने के बदले दुल्हन देने) की अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है।

यदि किसी के पास बदले में देने को बेटी न हुई तो बेटे को विवाह से पहले पांच से दस साल तक ससुराल में चाकरी करनी होगी। इस ‘कैद’ में उसे लड़की के घर मवेशी चरान-चुगान और जंगल से चारा-पत्ती लाने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। रोचक बात देखिए कि इस बिरादरी में विवाह समारोह के दौरान महिला संगीत की जगह पुरुष गायन का आयोजन होता है। वो भी बिना किसी साज-बाज (वाद्ययंत्र) के। दावत में शामिल होने वाले बरातियों व अन्य मेहमानों को अनिवार्य रूप से दूध, घी व मक्खन साथ लाना पड़ता है, जिसे जौहार कहते हैं।

जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर और उससे सटे बंगाण क्षेत्र के कुछ ग्रामीण इलाकों में पीढ़ियों से बसी गुर्जर बिरादरी में पांच से 10 साल की उम्र में ही लड़के-लड़की की शादी तय हो जाती है। लेकिन, विवाह में पारंपरिक कायदों को मानना अनिवार्य है। मुख्य कायदा है दुल्हन के बदले दुल्हन देने का। यानी वर पक्ष दुल्हन लेने के बदले कन्या पक्ष को भी दुल्हन देने के लिए बाध्य है। जिसे साटा-पल्टा प्रथा कहते हैं। किसी परिवार के पास बदले में देने को लड़की न हो तो बेटे को लड़की के घर विवाह से पहले घरजमाई बनकर रहना होगा। दोनों पक्षों के बीच तय हुए समय (पांच से दस साल) तक लड़के को होने वाली ससुराल में रहकर मवेशी चुगाने, जंगल से चारापत्ती लाने आदि की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। इस पर खरा उतरने के बाद ही उसे लड़की सौंपी जाती है। विवाह की तिथि निर्धारित होते ही बिरादरी का मुखिया (सरपंच) पंचायत बुलाकर सभी को शादी की दावत में आने का न्यौता देता है।

 

विवाह के दिन बरातियों व अन्य मेहमानों को साथ में दूध, घी व मक्खन अनिवार्य रूप से लाना होता है। दोहरे विवाह समारोह में तीन से चार दिन तक चावल, घी व बूरे की दावत चलती है। साथ ही महिला संगीत के बजाए पुरुष गायन का आयोजन होता है। जिसमें पुरुष पूरी रात कान में अंगुली डालकर सूफियाना अंदाज में गीत व कव्वाली गाते हैं, इसे स्थानीय भाषा में बैंत कहा जाता है। समारोह में वाद्ययंत्रों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। गुर्जर बिरादरी के मुखिया शफी अहमद बताते हैं कि उनके समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है।

 

इन इलाकों में गुर्जरों के 500 परिवार

जौनसार-बावर और उससे सटे बंगाण क्षेत्र के अटाल, प्लासू, चांदनी, चातरा के खेड़ा ब्यूलाड, खेड़ा शील, दारागाड, धनरास, दार्मीगाड, मैंद्रथ, शूनीर, कंठग, भंखवाड़, तलवाड़, सटोरी, नूणागाड, खूनीगाड, मोरा, शकरियान समेत आसपास के गांवों में गुर्जर बिरादरी के पांच सौ से ज्यादा परिवार रहते हैं। इनकी आर्थिकी का मुख्य जरिया पशुपालन व खेतीबाड़ी है। बिरादरी में मुश्किल से दो फीसद लोग ही शिक्षित हैं।

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