उत्तराखंड सूचना आयोग का सच जानेंगे तो हो जायेगे हैरान

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उत्तराखंड सूचना आयोग का सच जानेंगे तो हो जायेगे हैरान

देहरादून दुसरो के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला सूचना आयोग अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सका है यही नहीं हर वर्ष होने वाले जागरूकता प्रोग्राम तक नहीं बना सका ये विभाग अपनी हर वर्ष सरकार को दी जाने वाली अपनी रिपोर्ट तक नहीं दे सका है बड़ा सवाल ये उठ रहा है जब सरकारी खजाने से मोती पगार लेकर यहाँ बैठे अधिकारी क्या कर रहे है जनता से जुड़े इस आयोग को लेकर सवालिया निशान भी उठ खड़े हुए है भड़ास फॉर इंडिया को सूचना अधिकार से ली गयी जानकारी भेजने वाले एडवोकेट का साफ़ कहना है की उत्तरखंड सूचना आयोग पारदर्शी तरीके से अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभा

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पारदर्शिता तथा जाबवदेही के उद्देश्य की पूर्ति के लिये लागू क्रांतिकारी कानून सूचना अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की पहरेदारी करने की जिम्मेदारी जिस सूचना आयोग की है वहीं खुद पारदर्शिता व जवाबदेही से बच रहा है। इसका खुलासा सूचना अधिकार के अन्तर्गत ही सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन को उपलब्ध करायी गयी सूचना सेे हुआ।
काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने उत्तराखंड सूचना आयोग के लोक सूचना अधिकारी से सूचना आयोग के गठन से सूचना देने के तिथि तक धारा 25(1) के अन्तर्गत तैयार की गयी व सरकार को भेजी गयी वार्षिक रिपोर्टोें की प्रतियां मांगी। इसके अतिरिक्त उन्होंने आयोग गठन से सूचना उपलब्ध करानेे की तिथि तक आयोग द्वारा आयोजित कार्यशालाओं, संगोष्ठियों गोेष्ठियों तथा सेमिनारों तथा सूचना अधिकार वर्ष गांठ कार्यक्रमों की रिपोर्टों की प्रतियां मांगी।

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श्री नदीम को इस सूचना प्रार्थना पत्र के उत्तर में लोक सूचना अधिकारी/सहायक लेखाधिकारी मनमोहन नैथानी ने वर्ष 2005-06 से 2010-11 तक की रिपोर्टों की प्रतियां तो उपलब्ध करायी लेकिन 2011-12, 2012-13, 2013-14 की प्रतियां विधानसभा में पटलीकृत न होने के आधार पर उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया। साथ ही आयोेग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों, गोष्ठियांें, संगोष्ठियों की रिपोर्टों के सूचना आयोग कार्यालय में धारित न होने का उल्लेख करते हुये उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया।
श्री नदीम ने वांछित पूर्ण सूचना प्राप्ति हेतु प्रथम अपील सचिव उत्तराखंड सूचना आयोग को की तथा इसमें आयोग द्वारा धारा 4 के प्रावधानों के समुचित पालन न होने तथा सूचना मैनुअल अपडेट व पूर्ण न होने को भी अगवत कराया तथा वांछित पूर्ण सूचना उपलब्ध कराने तथा सूचना अधिकार अधिनियम का पूर्ण पालन सुनिश्चित कराने का निवेदन किया।
प्रथम अपीलीय अधिकारी/सचिव उत्तराखंड सूचना आयोग नरेन्द्र सिंह ने अपील सं0 216/2015 में अपीलीय निर्णय दि0 27 जनवरी 2016 से अपील का निस्तारण करते हुये 2011-12 से 2013-14 की वार्षिक रिपोर्टों की प्रतियां उपलब्ध कराने से इंकार को सही मानते हुये पैैरा 3 मेें लिखा हैै कि वर्ष 2011-12 से वर्ष 2013-14 तक की वार्षिक प्रतिवेदन अभी तक विधानसभा पटल पर प्रस्तुत न होने से वह अभी तक मा0 विधान सभा द्वारा पटलीकृत एवं अंगीकृत न होने से यह सूचना विधानसभा के विशेषाधिकार होने के कारण, मा0 विधान सभा द्वारा अंगीकृत किये जाने से पूर्व आयोग कार्यालय से सार्वजनिक किया जाना उचित नहीं है। उल्लेखनीय है कि यह सभी वार्षिक रिपोर्टों को हर वर्ष समाप्त होते ही यथाशीघ्र सरकार को देने तथा उसे विधानसभा के समक्ष रखने के धारा 25 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुये देरी से 20 अप्रैल 2015 को आयोग द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग को प्रेषित की गयी हैै।
वर्ष 2014-15 की रिपोर्ट अभी तक तैयार न होने की पुष्टि करते हुये सचिव द्वारा अपील निर्णय के पैरा 4 में लिखा गया है कि वर्ष 2014-15 के वार्षिक प्रतिवेदन की विषय वस्तु को पूर्ण कर लिया गया है तथा वर्तमान में प्रिंटिंग प्रेस में इसके पृष्ठ-अभिन्यास की प्र्रक्रिया (एम.एस.वर्ड तथा एम.एस.एक्सेल सेे कोरल ड्रा में परिवर्तन) पूर्ण की जा रही है इसके उपरान्त वार्षिक प्रतिवेदन का प्रतिरूप तैय्यार कराने, प्रुफ पढ़ने, अशुद्धियां दूर करने तथा मा0 प्रभारी मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा अंतिम रूप से विवीक्षा करने एवं उनके अनुमोदन के उपरान्त ही उसकी प्रतियां छपाने की प्रक्रिया पूर्ण हो सकेगी।
आयोग द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की रिपोर्टों की सूचना आयोग में धारित न होने की पुष्टि करते हुये अपील निर्णय के पैरा 5 में लिखा गया हैै कि आयोग द्वारा आयोजित कार्यशाला संगोष्ठियोें व गोष्ठियों तथा सेमिनार तथा सूचना अधिकार वर्षगांठ कार्यक्रम की तैयार रिपोर्ट की प्रतियां आयोग में धारित नहीं हैं, लोक सूचना अधिकारी द्वारा यह भी बताया गया कि आयोग स्तर पर प्रतिवर्ष सूचना का अधिकार दिवस माह अक्टूबर में मनाया जाता है जिसका कोई कार्य़वृत्त/रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।
श्री नदीम ने बताया कि खुद सूचना आयोग ने 2009 में उनकी अपील सं0 1266 पर राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट की प्रति विधानसभा में रखने से पूर्व ही आवेदक को उपलब्ध कराने तथा उत्तराखंड पोर्टल पर सार्वजनिक करने का आदेश दिया था अब अपने मामले में ऐसा बहाना कैसे किया जा सकता है। सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 25 में वर्ष समाप्त होने पर शीघ्र वर्ष भर का सूचना अधिकार का लेखा जोखा वार्षिक रिपोर्ट के रूप में बनाकर सरकार को देने तथा उसके द्वारा विधानसभा के समक्ष यथाशीघ्र रखवाये जाने का प्रावधान है। इसमें सूचना अधिकार क्रियान्वयन के सुधार के लिये सिफारिशोें का भी समावेश होता है। जब सूचना आयोग द्वारा ही अपने प्रतिवेदन कई-कई साल की देेरी से सरकार को दिये जा रहे है तो उनकी दी गयी सिफारिशों का ही क्या औचित्य रह जायेेगा।

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