उत्तराखंड सूचना विभाग का कारनामा

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उत्तराखंड सूचना विभाग का कारनामा 
सरकार की हर खबर को मीडिया के माध्यम से जनता तक ले जाने की जिम्मेदारी सूचना विभाग की होती है लेकिन ये विभाग सरकार के नए वर्ष को लेकर इतना पहलवान हो गया की ऎसे कैलेंडर छाप डाले जिम में तारीखे तक गलत प्रकशित की गयी है यही नहीं पूर्व में भी विभाग सूचना के कई प्रिंटिंग के कामो में लापरवाही को अंजाम दे चूका है लम्बी चौड़ी कई अफसरों की टीम भी इस कारनामे को नहीं देख पायी और सरकार की किरकिरी सभी जनपदो में भेजे गए नए साल के कैलेंडरों को लेकर करवा डाली

उत्तराखंड में फरवरी महा में दो २९ तारीखे होगी ज़रा आप भी देखे
देहरादून शायद ही किसी ने कभी सोचा होगा कि किसी माह में 18 तारीख के बाद उन्नतीस तारीख आती हो अथवा एक ही माह में दोबार लगातार एक ही तारीख आती हो। ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है प्रदेश के सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग ने जहाँ दो वरिष्ठ अधिकारी एक सम्पादक एवं दूसरे सहायक सम्पादक (दोनों प्रतियोगी परीक्षाओं से चयनित विद्वान) मा0 मुख्यमंत्री एवं प्रदेश सरकार के प्रचार-प्रसार के प्रकाशन व सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।
प्रदेश के सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष कलैण्डरों के प्रकाशन पर एक बड़ी धनराशी व्यय की जाती है इस वर्ष भी तीन प्रकार के कलैण्डर सूचना विभाग के सतत् प्रयासों से जारी किये गए हैं। जिनमें से एक कलैण्डर माननीय मुख्यमंत्री के विशेष निर्देशों पर एप्पण (रंगोली) को प्रोत्साहित करने के लिए जारी किया गया।
एप्पण से सम्बंधित कलैण्डर में माह फरवरी की अट्ठारह(18) तारीख के बाद उन्नतीस(29) तारीख दर्शाई गई है जबकि माह मई में नौ तारीख के पश्चात् आने वाली दस तारीख को नौ ही दिखाया गया है। इससे जाहिर होता है कि सूचना विभाग माननीय मुख्यमंत्री जी के निर्देशों और उनके प्रचार-प्रसार को लेकर कितना संजीदा है।
एप्पण/रंगोली वाले कलैण्डर को प्रकाशित कर दिये जाने के उपरान्त एक पृष्ठ का पोस्टर आकार का कलैण्डर जिसमें देश के शीर्ष सैन्य शिक्षण संस्थान ‘‘भारतीय सैन्य अकादमी’’ का चित्रण है, उसमें भी एप्पण आर्ट वाले कलैण्डर की भांति गलत तिथियाँ प्रकाशित की गई हैं जिससे स्पष्ट होता है कि सूचना विभाग और उसके अधिकारी अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में कितने सजग है। यदि एप्पण आर्ट कलैण्डर को प्रकाशन के उपरान्त भी सम्पादक-सहसम्पादक द्वै ने जांच कर लिया होता तो यह त्रुटि जन सामान्य के नजरों में न आई होती। बेहतर तो यह होता कि एप्पण आर्ट वाले कलैण्डर को प्रकाशन से पूर्व जांच (प्रूफ रीडिंग) करने के साथ-साथ प्रकाशन पश्चात जारी किये जाने/वितरण से पूर्व जांच लिया जाता। सोने पे सुहागा यह कि एप्पण आर्ट वाले कलैण्डर को जारी करने के उपरान्त भारतीय सैन्य अकादमी के चित्रण वाले कलैण्डर के प्रकाशन में भी इन्हीं त्रुटियों को दोहराया गया है, जो सम्बंधित अधिकारियों की घोर लापरवाही का प्रतीक है।
उक्त दोनों कलैण्डरों में चैदह नवम्बर को गुरू नानक देव की जयंती के रूप में दर्शाया गया है जबकि विगत वर्ष की विभागीय सूचना निर्देशनी में इस दिवस को 25 नवम्बर का दिखाया गया था। इस तथ्य से सभी भली-भांति अवगत हैं कि जयंती/शहीदी दिवस जैसे अवसरों की तिथियाँ अपरिवर्तनीय होती हैं। यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवम्बर को देश भर में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसे प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने ही अपने कलैण्डर में विस्मृत कर दिया। इन दोनो कलैण्डरों में दर्शाई गई ऐसी विशेष तिथियों (तारांकित)के सम्बंध में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि इन तिथियों का प्रकाशन किस संदर्भ में किया गया है, ये दिवस राजपत्रित अवकाश हैं अथवा अन्य विशेष तिथि या दिवस।
उपरोक्त दोनों कलैण्डरों के प्रकाशन के साथ ही सूचना विभाग ने 12 पेज का एक बहु आयामी कलैण्डर भी प्रकाशित किया है जिसमें एप्पण से लेकर लोक-कला, संस्कृति, योग, हस्तशिल्प आदि अनेकों परिदृश्य प्रदशित किये गए हैं। सम्भवतः आम-जन तक इन कलैण्डरों की पहुँच भी सुनिश्चित नहीं की गई तभी तो सूचना विभाग तथा जिला सूचना कार्यालय में इन कलैण्डरों के ढ़ेर आसानी से देख जा सकते हैं। इस सम्बंध में जिला सूचना कार्यालय में पहुँचे एक पाठक का कहना था कि क्या फर्क पड़ता है जब पैसा जनता का है तो अधिकारियों को इसकी क्या चिन्ता कि इस पैसे की उपयोगिता उस आम आदमी तक पहुँचे या नहीं जिसका इस पर प्रथम अधिकार है। जनता के धन का इस प्रकार दुरूपयोग जनविरोधी कार्य एवं निंदनीय है।
प्रदेश सरकार द्वारा जारी किये जाने वाले कलैण्डर अनेकों तरह से प्रभावी व सरकार के प्रसार प्रचार की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं बशर्ते कि इनमें प्रकाशित सामग्री उपयुक्त हो तथा इन्हें बेहतर विधि से वितरण कर जन-जन तक पहुँचाया जाए। अव्वल तो प्रकाशित कलैण्डरों/मैग्जिनों/अन्य वितरण सामग्रियों का कार्यालयों में लगा अम्बार बता रहा है कि ऐसे प्रकाशन अधिकारियों के सुविधा शुल्क उपार्जन से अधिक कुछ और नहीं हैं।

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