उत्तराखंड राज्यपाल सरकार को अपने इशारे पर चला रहा ये पंडित

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दीपक आज़ाद-
देहरादून मास्टरी करने वाला कोई शख्स कैसे सत्ता प्रतिष्ठान को अपने अंगुलियों के इशारे पर नचा सकता है, इसे समझना हो तो उत्तराखंड में चर्चा का विषय बने मुत्युंजय मिश्रा की बहुरूपिया तिकड़मों को जानना जरूरी है। शाातिर टाइप का यह शख्स पिछले कई सालों से अपनी हरकतों की वजह से सुर्खियों में है। मिश्रा के शातिरानापन का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के राज्यपाल भी उसके सामने बेबस-बेदम नजर आते हैं। एक मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक जिस शख्स को विश्विद्यालय के कुलसचिव की कुर्सी से हटाने के आदेश दे चुके हों, वह न केवल अपनी तिकड़मों से कुर्सी पर काबिज है बल्कि उसने ऐसा मकड़जाल फैलाया कि अब सदा-सदा के लिए ही विवि के रजिस्टार की कुर्सी खुदके लिए आरक्षित करवा ली।

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलसचिव की कुर्सी पर बैठे मुत्युंजय मिश्रा के शातिरानापन को समझने-बूझने के लिए करीब नौ साल पहले 2007 की ओर लौटना होगा। इसी साल राज्य के सरकारी डिग्री काॅलेज में मास्टरी की नौकरी करने वाले मिश्रा ने भाजपाई मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के राज में ऐसा जुगाड़ बैठाया कि वह सीधे मास्टरी की नौकरी को अलविदा कहकर नए-नए वजूद में आए उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में कुलसचिव की कुर्सी पर कोई योग्यता न होते हुए भी कब्जा करने में कामयाब हो गया। यहा रहते हुए मिश्रा ने खूब कलाबाजिया दिर्खाइं। यहां तक कि उसके खिलाफ धोखाधड़ी का एक मामला तो कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंचा। हालांकि बाद में मिश्रा यह दावा करते रहे हैं कि वे इस मामले में बेदाग बाहर निकले हैं। करीब तीन साल तक तकनीकी विश्वविद्यालय में कलाबाजी दिखाते रहे मिश्रा को साल 2010 में कुलसचिव की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। देहराूदन की हवा-पानी के अभस्त हो चुके मिश्रा ने इसके बाद करीब दो साल तक उच्च शिक्षा निदेशालय में उपनिदेशक की कुर्सी पर रहे। लेकिन यहां भी मिश्रा का मन नहीं लगा और वे फिर किसी ऐसी कुर्सी की तलाश में लग गए जहां वे अपनी कलाबाजियां दिखा सके। इसके लिए मिश्रा की पारखी नजर पहले अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र ‘ यूसैक’ में निदेशक की कुर्सी पर लगी। लेकिन तब अपनी ईमानदारी के जाने जाने वाले नौकरशाह मंजुल कुमार जोशी और सुरेन्द्र सिंह रावत ने अपने रहते हुए मिश्रा की निदेशक बनने की चाहत को पूरी नहीं होने दिया। इसके बावजूद मिश्रा ने हार नहीं मानी और फिर उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय पर अपनी गिद्व दृष्टि गड़ा दी। साल 2013 में मिश्रा अपनी जुगाडु़ कलाबाजियों के सहारे कोई योग्यता न होने के बावजूद उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय का कुलसचिव बन बैठा। तभी से मिश्रा की नियुक्ति पर सवाल उठते रहे हैं। शिकायतों का पुलिंदा पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से लेकर राजभवन तक भी पहुंचा। तब बहुगुणा ने भी मिश्रा की नियुक्ति को गैरकानूनी करार देते हुए उसकी नियुक्ति को निरस्त करते हुए नये कुलसचिव की नियुक्ति के आदेश दिए। इधर राज्यपाल ने भी मिश्रा की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कई मर्तबा शासन को कार्रवाई करने के निदेश दिए। मगर आयुष मंत्रालय ने दोनों आदेशों को दबा दिया। मिश्रा ने इसके ragistarलिए कहां-कहां और किसे-किसे गांठा यह एक अलग कहानी है।
राज्यपाल केके पाॅल को भी अपने शातिरानापन के आगे बेबस-बेदम साबित करने वाले मिश्रा अपनी सफलता पर चहेतों को मिठाईयां बांटता दिख रहा है। हो भी क्यों न जब मिश्रा उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय में आजीवन कुलसचिव बन बैठा है। साथ ही कुलसचिव पद के लिए आये दर्जनों विद्वानों के आवेदनों को आंख दिखा दी गई है। अपनी तिकड़मों से सबको पछाड़ते हुए मिश्रा ने अपने पद का उच्च शिक्षा से आयुश शिक्षा में संविलियन करा दिया। उसके इस कुकृत्य में सत्ता प्रतिष्ठान के लोग और शासन के नौकरशाह शामिल हैं।

खास बात ये है राजनीति शास्त्र के इस मास्टर को आयुर्वेद का कोई ज्ञान नहीं है। इसके पास एक ही डिग्री है और वह है नेताओं से लेकर आईएएस अफसरों को अपने हिसाब से सेट करना। जिसको जो चाहिए मिश्रा उसके मुताबिक हर चीज मुहैया करा देता है। यही वजह है कि राज्यपाल द्वारा जरूरी योग्यता न होने के बावजूद कुलसचिव की कुर्सी पर बैठे मिश्रा को हटाने के आदेशों को भी दरकिनार करते हुए इसे स्थायी तौर पर कुलसचिव बना दिया गया। उत्तराखंड शायद देश में पहला राज्य होगा जिसने अपने किसी विश्वविद्यालय में कुलसचिव की कुर्सी पर आजीवन भर्ती की हो। इसके बावजूद कि इसकी न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और न ही आयुर्वेद विश्वविद्यालय अधिनियम की इजाजत देता है।

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