उत्तराखण्ड में कौन सियार और क्या सियार बगड़ का सच

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दीपक आजाद-
देहरादून  उत्तराखंड ।  क्यों और किन लोगों के लिए बना, आज यह सवाल हमारे नेताओं के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार की चासनी में खुदको गले तक तर-बतर किए जाने से नेपथ्य में धकेल दिया गया है। नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों और किस्म-किस्म के माफिया तत्वों के गठजोड़ ने इस राज्य के पीछे की मूल भावन को ही खत्म कर डाला है। पूरी बहस ही संसाधनों को लूटने और कुर्सी पाने या उस पर बने रहने के लिए सियारवादी विलाप करने तक सिमट गया है। गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के सवाल पर जो कुछ हो रहा है, वह सबके सामने है।

राज्य के दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए न तो भाजपाई सरकार में कोई चिंतन-मनन था और न ही मौजूदा सरकार में ही। जो कुछ बाहरी तौर पर दिखाने की कोशिश हो रही है वह केवल कुर्सी पाने या उसके बचाए रखने तक का गुणा-भाग तक सीमित है। मुख्यमंत्री हरीश रावत और भाजपाई अजय भटट के बीच असल मुददों पर बात करने के बचाय जो तू-तू, मैं-मैं का खेल हो रहा है, उसमें वे सवाल कहीं नहीं हैं जो जनता की जिंदगी से जुड़े हैं। इस राज्य में संसाधनों की कमी नहीं है, यह एक सच्चाई है। लेकिन नेताओं के निकम्मेपन ने इस राज्य को आज चैराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। हर साल इस राज्य पर आसमानी आपदा का कहर बरपता है, उसको लेकर सरकार की संवेदनशीलता का हाल ये है कि पिछले कई सालों से सैकड़ों गांव आज भी पुर्नवास का इंतजार में हैं। देहरादून में कुर्सी के लिए मारामारी करने वालों की नजर इन गांवों पर नहीं जाती।

देहरादून में कोदा-झंगोरा की बात होती है, लेकिन जोशीमठ के गांवों में भारी मात्रा में राजमा सड़ने के कगार पर पहंुच चुकी है। इन अंधेरे कोनों के बीच हाल के दिनों में सांसद प्रदीप टम्टा की पिछले दिनों राज्य के दुर्गम क्षेत्रों में से एक सर-बडियार घाटी की यात्रा करना सियासत का एक सुखद पहलू है। वे अधिकारियों के साथ इस दुर्गम यात्रा पर गए और लोगों को कुछ भरोसा भी दे आए कि वे उनकी तकलीफ को कुछ कम करने की दिशा में कोशिश करेंगे।

इस यात्रा में शामिल रहे विजय पाल रावत ने यहां के वाशिंदों की विकट जिंदगी का जो ब्योरा बयां किया है वह बताता है कि इस घाटी में कई किमी पैदल चलकर कोई नेता पहली बार यहां पहुंचा। स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर सड़क जैसी जीवन की बुनियादी सहूलियतें तक आज तक यहां ग्रामीणों को मयस्यर नहीं हो पायी हैं। सीएम हरीश रावत की छाया में अब तक सियासत की सीढ़िया चढ़ते आने के बावजूद प्रदीप टम्टा अभी तक अपने इर्द-गिर्द लम्पटों की सेना खड़ी करने से दूर रहे हैं, यह उनका एक सकारात्मक पक्ष है। इस पक्ष को वे आगे कहां तक बरकरार रख पाएंगे, यही उनकी भविष्य  की राजनीति का दर्पण होगा। वे आगे भी जनता से जमीनी संवाद बनाते हुए इस राज्य को दिशा भ्रम से बाहर निकालने में अपना कुछ सार्थक योग दे पाए तो वे अपने ज्यादातर समकालीनों की तरह हिकारत के पात्र नहीं बनेंगे, ऐसी अपेक्षा है।

विजयपाल सिंह रावत-

लाख बदहाली के बावजूद ये उनका घर है, ये सर-बडियार है

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बचपन से ही सुनता था की दुनिया सरनौल तक है उसके बाद बडियार है। वहाँ के दुर्गम रास्तों और बदहाल जीवन किस्सों को बचपन से सुनता आया हूं। मैं कक्षा 7 में पढ़ता था, जब पहली बार डायट बडकोट के अध्यापक और मेरे पड़ोसी बलबीर चौहान मामाजी के साथ गंगनानी से लगभग 18 किलोमीटर पैदल उनके गाँव सरनौल गया था। सरनौल गांव ठकराल पट्टी का अंतिम गाँव और बडियार क्षेत्र प्रारंभिक पड़ाव हैं।

“पलायन एक चिंतन” दल के संयोजक भाई रतन असवाल ने पत्रकार  मनोज ईष्टवाल से सुना था कि बडियार घाटी बहुत खूबसूरत घाटी है।खूबसूरत घाटी में पर्यटन की संभावनाओं को तलाशने रतन असवाल एक वर्ष पूर्व स्थानीय पत्रकार ओंकार बहुगुणा के साथ यहाँ पंहुचे थे। लेकिन यहाँ के बदहाल जन-जीवन को देखकर वे दंग रह गये। स्कूल था लेकिन छत नहीं, बच्चे थे लेकिन अध्यापक नहीं। पूरे बडियार के आठ गाँव में सड़क तो दूर की बात पैदल चलने के ठीक रास्ते तक नहीं हैं। पूरे बडियार क्षेत्र में एक आयुर्वेदिक फार्मेसिस्ट वो भी लगभग अनुपस्थित ही रहते हैं। आठ गाँव में कहीं भी एक शौचालय तक नहीं हैं। अनेक महिलायें प्रसव पीड़ा में रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं।

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भाई रतन असवाल ने इन बदहालीयों के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया और दो माह पूर्व पलायन एक चिंतन दल के साथ हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार भाई अरविंद मुदगिल को पुनः अपने साथ ले गये। वहाँ की अव्यवस्था को समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से जोर-शोर से उठाया।कांग्रेस सांसद प्रदीप टमटा ने भी इसे पढ़ा और सांसद बनते ही सबसे पहले “पलायन चिंतन दल” के साथ बडियार क्षेत्र में जाने की इच्छा जाहिर करी।

दिनांक 13 जुलाई को “पलायन एक चिंतन” दल सांसद प्रदीप टमटा, महेश कांडपाल जी, डा0 अरूण खुगशाल जी के साथ बडकोट पंहुचा और विभागों की समीक्षा बैठक में सांसद टमटा ने सभी अधिकारियों को बडियार चलने का आदेश दिया। सांसद के साथ अधिकारियों का काफिला सरनौल तक मोटर मार्ग से पंहुचने के बाद बडियार घाटी के लिये पैदल चल पड़ा। पूरे 40 किलोमीटर के रास्ते में बारिश और दुर्गम रास्तों में जोंक ने आतंक मचा रखा था।सभी लोग बरसात से उफनते गाड़-गदेरों को पार कर पौंटी गाँव पंहुचे जहाँ गाँव वासीयों से मुलाकात कर डिंगारी गाँव में रात्रि विश्राम को आगे बढे। रात को डिंगारी में गाँव वालों ने भारी बारिश के बावजूद जोरदार स्वागत किया। सम्मानजनक आतिथ्य संस्कार के बाद सुबह तड़के सभी लोग सर गाँव के लिये चल पड़े। गाँव-गाँव अधिकारियों और गाँववासीयों की बैठक करते हुऐ सांसद प्रदीप टमटा ने एक आत्मीयता से विश्वास दिलाया की वे जरूर यहाँ के लिये कुछ करेंगे।शाम तक सर से पैदल बडियार नदी के किनारे टूटी पगडंडीयों पर चलते हुए गंगराली मोटरपुल मार्ग तक पंहुचे जहाँ से वे सूदूर मोरी एवं जौनसार के क्षेत्र भ्रमण के लिये चल पड़े।

अपने पूरे जीवन में पहली बार किसी सांसद का इस दुर्गम क्षेत्र में जाना यहाँ के जनमानस में एक उम्मीद जगा गया। जिस सांसद को उन्होंने कभी वोट नहीं दिया वह उनके बीच पंहुचा तो यह अनेक स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिये एक सबक था जो आज तक वहाँ नहीं गये थे। टीम “पलायन एक चिंतन” की मुहिम रंग लायी है। सांसद प्रदीप टमटा से आग्रह है की वे इस बडियार क्षेत्र का एक गाँव गोद लेकर वर्षों से उपेक्षा के शिकार इन ग्रामीणों की परेशानीयों को दूर करने का काम करेंगे। इस पूरी मुहिम के संचालक  रतन असवाल को साधुवाद जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से मानवीय संवेदनाओं के मध्यनजर इस लड़ाई को एक वाजिब मुकाम तक पंहुचाया हैं।

अपने घरों से बाहर निकल अपने पड़ोस के घर की बदहाली का दुख बांटने से ही ये पहाड़ आगे बढ़ेगा। ये शिक्षा हमें भाई रतन असवाल और प्रदीप टमटा जी ने दी है। हमें इसे एक संस्कार के रूप में आगे बढाने के दृढ़ संकल्प लेना होगा।                                               ये लेख दीपक आज़ाद के वाच डॉग पोर्टल का साभार है

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