ठुकराल की ‘काट’ से खड़ी हो सकती है भाजपा की ‘खाट’

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ठुकराल की ‘काट’ से खड़ी हो सकती है भाजपा की ‘खाट’ 
पी.के. यादव
रुद्रपुर। विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद सरगर्म हुई शहर की सियासत अब जोर आजमाइश के बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है। एक और जहां ये बात लगभग पूरी तरह सापफ हो चुकी है कि रुद्रपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेसी उम्मीदवार तिलक राज बेहड़ ही होंगे, वहीं दूसरी तरपफ भाजपा के संभावित प्रत्याशी की तस्वीर अभी पूरी तरह सापफ नहीं हो सकी है। हालांकि भाजपा आलाकमान सभी सिटिंग विधायको को चुनाव में पिफर से प्रत्याशी बनाये जाने की बात कापफी पहले से कहती चली आ रही है, लेकिन रुद्रपुर में भाजपा के संभावित उम्मीदवार पर संशय पूर्ववत बरकरार है। कारण कि स्थानीय भाजपा नेताओ का एक बड़ा तबका विभिन्न कारणों से रुद्रपुर विधायक राजकुमार ठुकराल से नाखुश है। ठुकराल से नाराज भाजपा खेमा उनको संगठन से कटा हुआ, कमजोर उम्मीदवार निरूपित करते हुए सूबे के मुख्यमंत्राी हरीश रावत का नजदीकी मनाने के साथ ही, उनके विकल्प के रूप में भाजपा जिला अध्यक्ष शिव अरोरा को प्रस्तुत कर रहा है। यह सच है कि ठुकराल के नाम पर भाजपा में आम सहमति बनने के आसार कम हैं और ठुकराल संघ और उनके अनुषांगिक हिन्दूवादी संगठनो की पहली पसंद नहीं हैं। बावजूद इसके ठुकराल भाजपा की मजबूरी हैं, क्योंकि रुद्रपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के पास कांग्रेस के संभावित प्रत्याशी के मुकाबले, ठुकराल से अधिक वजनदार अन्य कोई चेहरा पिफलहाल तो मौजूद नहीं दिख पड़ता। यद्यपि भाजपा में अन्दरूनी स्तर पर पूर्व सांसद बलराज पासी, शिव अरोरा एवं उत्तम दत्ता को विकल्प केे रूप में देखा जा रहा है, मगर रुद्रपुर में तेजी से बन रहे सियासी समीकरणों के मद्देनजर इनमंे से कोई भी चेहरा पंजाबी बाहुल्य इस सीट पर भाजपा की नैÕया पार कर देने की गारंटी देता नहीं जान पड़ता। चूकि रुद्रपुर विधानसभा में पंजाबी वोटर निर्णायक हैं, इस लिहाज से शिव अरोरा, ठुकराल का एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। मगर ठुकराल की तुलना में अरोरा कुछ मायनो में हलके पड़ जाते हैं। इस में दो राय नहीं कि शिव एक अरसे से संघ और उसके अनुषांगिक संगठनो में सक्रिय रहे हैं और एक योग्य, उच्च शिक्षित एवं स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति की रूप में उनकी सामाजिक मान्यता भी हैं, पर उनको सक्रिय राजनीति का तजुर्बा ठुकराल से कम है, साथ ही वो वोट लेने के लिए पैंतरेबाजी, अभिनय, षड़यंत्रा और कुटिलता की उस हद तक नहीं जा सकते, जितना कि ठुकराल। लिहाजा कांग्रेस के संभावित प्रत्याशी की तुलना में अरोरा को, मजबूत मान कर पंजाबी समाज का वोट, उनके पीछे लामबंद हो सकेगा, ऐसे आसार कम ही हैं। बड़ी बात तो यह है कि रुद्रपुर विधानसभा से लगी किच्छा सीट पर सूबे के मुख्यमंत्राी हरीश रावत के चुनाव लड़ने की अटकलें शबाब पर हैं और अगर कहीं ये अटकलें सच साबित हुईं और रावत किच्छा से चुनाव लड़े तो, आस-पास की विधनसभा सीटों पर कांग्रेस का वातावरण बनेगा। इसका सीधा लाभ रुद्रपुर के कांग्रेसी प्रत्याशी को मिल सकता है और उसकी स्थिति कापफी मजबूत हो सकती है।

तो क्या इस बार ‘पीएम’ तय करेंगे रुद्रपुर का विधायक?

यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख बेहद जरूरी है कि चुनाव में जब जातीय समीकरण प्रभावी होता हैं, तो वोटर अपने बीच का वजनदार और जीत रहा प्रत्याशी खोजते हैं। सो, कांग्रेस के संभावित प्रत्याशी बहेड़ की तुलना में अरोरा का वजन कितना होगा? इसका अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं। इसके अलावा भाजपा में अंदर खाने यह विचार भी आकर पा रहा है, कि सूबे के मुखिया हरीश रावत के किच्छा से चुनाव न लड़ने की स्थिति में बलराज पासी को बहेड़ के मुकाबले उतारा जाये। कहने की जरुरत नहीं की अगर कहीं ऐसा हुआ, तो रुद्रपुर का सारा पंजाबी वोट बेहड़ के पक्ष में गोलबंद हो जायेगा, साथ ही स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा भी सर उठा लेगा, जो कि भाजपा के मंसूबों की ‘नाव’ में छेद करने वाला साबित हो सकता है। इसके आलावा एक कमजोर-सी संभावना ये भी हो सकती है कि रुद्रपुर के बंगाली वोटरों के सहारे वैतरिणीं पार करने की गर्ज से भाजपा पूर्व जिला अध्यक्ष उत्तम दत्ता के रूप में बंगाली कार्ड खेले। इस स्थिति में भी पंजाबी वोटर कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में लामबंद होंगे। सो, विश्लेषणात्मक रूप से देखंे तो रुद्रपुर में भाजपा द्वारा ठुकराल के स्थान पर किसी अन्य चेहरे पर दाव लगाने की स्थिति में क्षेत्रांतर्गत पीएम पफैक्टर निर्णायक हो सकता हैं और बड़ी सम्भावना है कि पीएम ;पी=पंजाबी और एम=मुस्लिम ही रुद्रपुर का नया विधायक तय कर दे, क्योंकि मुस्लिम तो कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक हैं ही और अगर भाजपा द्वारा वजनदार प्रत्याशी न दिए जाने के चलते रुद्रपुर का पंजाबी वोट भी कांग्रेस प्रत्याशी के लिए गोलबंद हो गया, तो भाजपा की जीत की संभानाएं रसातल में जा सकती हैं। कुल मिलाकर कतिपय मजबूरियों के चलते ठुकराल भाजपा के लिए अपरिहार्य बनते जा रहे हैं, पर उनको लेकर भाजपा की स्थिति साँप-छछंदर वाली है। मरता क्या न करता की तर्ज पर भाजपा नेतृत्व आखिर अब करे भी तो क्या? स्थानीय भाजपा के एक तबके को विधायक ठुकराल स्वीकार नहीं और यदि उनको खुश करने के लिए भाजपा नेतृत्व ने की ठुकराल की ‘काट’ तो रुद्रपुर में खड़ी हो सकती हैं भाजपा की ‘खाट’।

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