उत्तरायणी घुघुतिया रमेश भट्ट वायरल वीडियो

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देहरादून कुमाऊं के ‘उत्तरायणी’ पर्व को घुघुतिया त्योहार के नाम से जाना जाता है इस त्यौहार को हमारी संस्कृति कैसी थी इसको लेकर भी आने वाली पीड़ी इसको याद रखे इसके लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट ने एक अनूठी पहल की है जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है आखिर इस वीडियो में ऐसा क्या है जिसको लेकर हर जगह चर्चा हो रही है उनके कई सवाल आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शन का काम करेंगे।

 

कुमाऊं के ‘उत्तरायणी’ पर्व घुघुतिया त्योहार को लेकर मुख्यमंत्री के सलाहकार रमेश भट्ट ने अपनी संस्कृति को बचा कर रखे जाने की अपील की है उनके वीडियो में कुमायूँ भाषा का उपयोग किया गया है इस तरह की पहल उनके द्वारा किये जाने के बाद पहाड़ की संस्कृति को किस तरह बचा कर रखा जाना है इसके प्रयास भी किये गए है उनका ये प्रयास अपनी संस्कृति को बचाये रखने के लिए काफी अच्छा प्रयास माना जा रहा है इस तरह की पहल उत्तराखंड में किसी भी सरकार में आज तक नहीं की गई है जिसमे अपनी लुप्त होती संस्कृति को बचाये रखने के लिए पहल की गई हो।

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उत्तराखंड में आज हम अपनी संस्कृति को लुप्त करते जा रहे है जिसका सबसे बड़ा कारण आज की युवा पीढ़ी का अपनी संस्कृति से लगाव नहीं होना है हमें आज ये भी सोचना होगा अगर इसी तरह हमारा लगाव अपनी संस्कृति से दूर होता चला गया तो आने वाले दिनों में हमारी अगली पीढ़ी इस लुप्त होती जा रही त्यौहार मनाये जाने की परम्परा को खो देगी आज हमें अपनी लुप्त होती जा रही इस संस्कृति को बचाये जाने की जरुरत है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अपने त्यौहार को मनाये जाने की परम्परा को जिन्दा रख सके।

‘उत्तरायणी’ घुघुतिया की वो कहानी

कुमाऊं मंडल में ‘उत्तरायणी’ को घुघुतिया त्योहार के रूप में जाना जाता है। उत्तरायणी की पहली रात को लोग जागरण करते हैं। पहले इस जागरण में आंड-कांथ ;पहेलियां-लोकोक्तियांद्ध, फसक-फराव अपने आप गढ़ीबातेंद्ध, कुछ समासामयिक प्रसंगों पर भी बात होती थी। रात को ‘तत्वाणी’ गरम पानी से नहानाद्ध होती है। सुबह ठंडे पानी से नदी या नौलों में नहाने की परंपरा रही है। ‘उत्तरायणी’ की पहली शाम को आटा-गुड़ मिलाकर ‘घुघुते’ बनाने का रिवाज है। आटे के खिलौने, तलवार, डमरू आदि के साथ इन्हें पफूल और पफलों की माला में पिरोकर बच्चे गले में डालकर आवाज लगाते हुये कव्वों को आमंत्रित करते हैं-

काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले।
ले कव्वा बड़, मैंके दिजा सुनौंक घ्वड़।
ले कव्वा ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल।
ले कोव्वा पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुर।
ले कौव्वा तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार।

कुमाऊं क्षेत्र में ‘उत्तरायणी’ के संदर्भ में कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। इनमें एक कहानी यह है कि पुरातन काल में यहां कोई राजा था। उसे ज्योतिषयों ने बताया कि उस पर मारक ग्रहदशा है। यदि वह ‘मकर संक्रान्ति’ के दिन बच्चों के हाथ से कव्वों को घुघुतों फाख्ता पक्षीद्ध का भोजन कराये तो उसके इस ग्रहयोग के प्रभाव का निराकरण हो जायेगा। लेकिन राजा अहिंसावादी था। उसने आटे के प्रतीात्मक घुघुते तलवाकर बच्चों द्वारा कव्वों को खिलाया। तब से यह परंपरा चल पड़ी। इस तरह की और कहानियां भी हैं। फिलहाल ‘उत्तरायणी’ का एक पक्ष मान्यताओं पर आधारित है। गढ़वाल में ‘उत्तरायणी’ को ‘मकरैणी’ के नाम से जाना जाता है। उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी, चमोली में ‘मकरैणी’ को उसी रूप में मनाया जाता है,

जिस तरह कुमाऊं मंडल में। यहां कई जगह इसे ‘चुन्या त्यार’ भी कहा जाता है। इस दिन दाल, चावल, झंगोरा आदि सात अनाजों को पीसकर उससे एक विशेष व्यंजन ‘चुन्या’ तैयार किया जाता है। इसी प्रकार इस दिन उड़द की खिचड़ी ब्राह्मणों को दिये जाने और स्वयं खाने को ‘खिचड़ी त्यार’ भी कहा जाता है। ऐसे भी कुछ क्षेत्र हैं जहां घुघुुतों के समान ही आटे के मीठे ‘घोल्डा/घ्वौलों’ ;मृगोंद्ध के बनाये जाने के कारण इसे ‘घल्डिया’ या ‘घ्वौल’ भी कहा जाता है।‘उत्तरायणी’ के दिन पौड़ी गढ़वाल जिले एकेश्वर विकासखंड के डाडामंडी, थलनाड़ी आदि जगहों पर ‘गिंदी मेले’ का आयोजन होता है। ‘गिंदी मेलों’का पहाड़ों में बहुत महत्व है। यह मेला माघ महीने की शुरुआत में कई जगह होता है। डाडामंडी और थलनाड़ी के ‘गिंदी मेले’ बहुत मशहूर हैं। दूर-दूर से लोग इन मेलों में शामिल होने के लिए आते हैं। मेले में गांव के लोग एक मैदान में दो हिस्सों में बंट जाते हैं। दोनों टीमों के सदस्य एक डंडे की मदद से गेंद को अपनी तरपफ कोशिश करती हैं। एक तरह से यह पहाड़ी हाॅकी का रूप है। कुमाऊं में इसे ‘गिर’ कहते हैं।

उत्तरायणी और सामाजिक चेतना‘उत्तरायणी’ का जहां सांस्कृतिक महत्व है, वहीं यह हमारी चेतना और संकल्पों को मजबूत करने वाला त्योहार भी है। परंपरागत रूप से मनाई जाने वाली ‘उत्तरायणी’ स्वतंत्राता आंदोलन के समय जन चेतना की अलख जगाने लगी। आजादी की लड़ाई के दौर में जब 1916 में कुमाऊं परिषद बनी तो आजादी के आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। अपनी समस्याओं के समाधान के लिये स्थानीय स्तर पर जो लोग लड़ रहे थे उन्हें लगा कि आजादी ही हमारी समस्याओं का समाधान है। इसलिये बड़ी संख्या में लोग संगठित होकर कुमाऊं परिषद के साथ जुड़ने लगे।

अंग्रेजी शासन में ‘कुली बेगार’ की प्रथा बहुत कष्टकारी थी। अंग्रेज जहां से गुजरते किसी भी पहाड़ी को अपना ‘कुली’ बना लेते। उसके एवज में उसे पगार भी नहीं दी जाती। अंग्रेजों ने इसेे स्थानीय जनता के मानसिक और शारीरिक शोषण का हथियार बना लिया था। इसके खिलापफ प्रतिकार की आवाजें उठने लगी थी। धीरे-धीरे इस प्रतिकार ने संगठित रूप लेना शुरू किया। कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को बागेश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में हजारों लोग इकट्ठा हुये। सबने सरयू-गोमती नदी के संगम का जल उठाकर संकल्प लिया कि ‘हम कुली बेगार नहीं देंगे।’ कमिश्नर डायबिल बड़ी पफौज के साथ वहां पहुंचा था। वह आंदोलनकारियों पर गोली चलाना चाहता था, लेकिन जब उसे अंदाजा हुआ कि अधिकतर थोकदार और मालगुजार आंदोलनकारियों के प्रभाव में हैं तो वह चेतावनी तक नहीं दे पाया। इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलापफ खड़ा हो गया। हजारों लोगों ने ‘कुली रजिस्टर’ सरयू में डाल दिये। इस आंदोलन के सूत्राधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल, विक्टर मोहन जोशी आदि महत्वपूर्ण थे।

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