राज्यपाल डा0 कृष्णकांत पाल ने किया वैज्ञानिकों का आह्वान

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राज्यपाल डा0 कृष्णकांत पाल ने किया वैज्ञानिकों का आह्वान

देहरादून उत्तराखण्ड के राज्यपाल डा0 कृष्णकांत पाल ने वैज्ञानिकों का आह्वान किया है कि प्रदेश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उपयुक्ततम इस्तेमाल की व्यावहारिक तकनीक खोजें। उन्होंने कहा कि अनुसंधान के क्षेत्र में वित्तीय सहायता के लिए उद्योग आगे आएं। उत्तराखण्ड में वनाग्नि की गम्भीर समस्या को नियंत्रित करने के लिए परम्परागत तरीके यानि पानी से आग बुझाने के तरीकों के अलावा, कुछ ऐसी नई तकनीक विकसित करने पर ध्यान देना आवश्यक है जिसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पडे़। उन्होंने सोलर पैनल्स पर चर्चा करते हुए कहा कि भारी वजन के सोलर पैनल्स पर धूल जमने से उनकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता कमजोर पड़ती है, जबकि हल्के वजन के पालीमर्स के उपयोग से सोलर तकनीक ज्यादा सहज हो सकती है इसलिए इस क्षेत्र में भी अभी और प्रयोगों की आवश्यकता है। राज्यपाल एफ.आर.आई. देहरादून में नासी (नेशनल अकादमी आॅफ साइंसेस, इण्डिया) के 86वें वार्षिक अधिवेशन में यू कोस्ट (उत्तराखण्ड काउंसिल आॅफ साइंस एण्ड टैक्नोलाॅजी) द्वारा ‘हिमालय परिक्षेत्र में मानव कल्याण के लिए साइंस प्रौद्योगिकी तथा उद्यामिता‘ विषय पर अयोजित वैज्ञानिको की संगोष्ठी (सिम्पोजियम) को सम्बेधित कर रहे हैं। संगोष्ठी का उद्घाटन करने के बाद सत्र को बतौर मुख्य अतिथि सम्बेाधित करते हुए राज्यपाल ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग निर्माणाधीन रेल परियोजना के परिपेक्ष्य में कहा कि संरचनात्मक स्थिरता के लिए प्रोजैक्ट का भू-वैज्ञानिक अध्ययन करना जरूरी है। उन्होंने प्रोजैक्ट पर कार्य शुरू करने से पहले यातायात प्रबंधन और टनल से निकलने वाली मिट्टी/गाद के निस्तारण जैसे सभी पहलुओं को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
राज्यपाल ने प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया की गति में तेजी के लिए खोज पर बल देते हुए कहा कि पहाड़ी कृषि को लाभदायी बनाने के लिए ऐसे बीजों को बडे़ पैमाने पर विकसित करना होगा जो कम वर्षा या सूखे की स्थिति में भी कामयाब हो सके। उन्होंने उत्तराखण्ड को औषधीय व सगंध पौधों का घर बताते हुए कहा कि इसकी खेती को प्रोत्साहित किये जाने की सख्त जरूरत है। देहरादून में स्थापित उत्तराखण्ड का एक मात्र सगंध पौधा केन्द्र (कैप) का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा, इस तरह की कई और इकाईयाँ प्रदेश में स्थापित की जानी चाहिए।
राज्यपाल ने उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में संगोष्ठी के लिए चुने गये विषय को बहुत दिलचस्प और प्रासंगिक बताते हुए हल्दी से निकाली गई चमत्कारिक दवा ब्नतबनउपद (करक्यूमिन) का उल्लेख किया। उन्होंने उत्तराखण्ड में इस संगोष्ठी के आयोजन पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि राज्य के मानव व प्राकृतिक संसाधनों के सतत् उपयोग से राज्य के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्तराखण्ड की जैव विविधता की वैश्विक स्तर पर पहचान (हाटस्पाॅट) स्थापित है। यहाँ पाई जाने वाले पौधों की, अनमोल जड़ी-बूटियो की कई दुर्लभ व बहुमूल्य प्रजातियाँ स्थानीय समुदाय की संस्कृति का अभिन्न अंग तथा जन-जीवन का हिस्सा बन चुकी है ।
राज्यपाल ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि कई कमजोरियों के बावजूद देश में विज्ञान शिक्षा पर बेहतर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अनुसंधान में व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया जाना चाहिए और यदि अमेरिका की तरह यहां भी उद्योग अनुसंधान में आर्थिक सहायता करें तो इससे विकास में काफी मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि विज्ञान व प्रोद्योगिकी उद्यमिता में कई तरह से मदद कर सकती हैं। इससे नये विचार और अवसरों की पहचान आसान हो जाती है। संसाधनों के सामूहिक उपयोग के लिये उनका चयन सरल हो जाता है, अनुसंधान और विकास के बीच की खाई पाटी जा सकती है और उद्यमिता प्रशिक्षण का काम सरल हो जाता है। राज्यपाल ने विश्वास व्यक्त किया है संगोष्ठी में हिमालयी पारस्थितिकी के संसाधनों के उपयोग पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा।

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