बिल्डरों नेताओं का गठजोड़ बना, यमुना प्राधिकरण में करोड़ो का घोटाला

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बिल्डरों नेताओं का गठजोड़ बना, यमुना प्राधिकरण में करोड़ो का घोटाला NOIDA YAMUNA DEVLOPMENT SCAM 2008 बिल्डरों नेताओं का गठजोड़ बना, यमुना प्राधिकरण में करोड़ो का घोटाला नॉएडा यमुना प्राधिकरण में बसपा शासन काल में बिल्डरों और नेताओं के बीच जमीन की खूब बंदरबांट मिलीभगत कर भूमि आवंटन के लिए सारे नियम-कानून ताक पर रख दिए गए। 2008 में जिस दर से किसानों से जमीन ली थी, उससे आधे रेट में बिल्डरों को बेचकर प्राधिकरण को भारी चूना लगाया गया। प्राधिकरण को इससे करीब 600 करोड़ रुपये की चपत लगी है। अपनी करतूत छिपाने के लिए अधिकारियों ने सस्ती दरों पर जमीन आवंटन का प्रस्ताव बोर्ड के सामने रखकर उसकी मुहर लगवा ली। बोर्ड की अनुमति के बाद शासन ने भी आंखें मूंद कर मंजूरी दे दी।

यमुना प्राधिकरण ने 2008 में सेक्टर 17ए में 1000 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर माइक्रो एसडीजेड के नाम से योजना निकाली। इसमें 25 से 250 एकड़ तक के भूखंड शामिल किए गए। हैरानी की बात यह है कि योजना के ब्रॉशर में कहीं भी माइक्रो एसडीजेड का जिक्र तक नहीं किया गया। ब्रॉशर में सिर्फ 25 से 250 एकड़ भूखंड की योजना लिखा गया। जबकि, बोर्ड में रखे प्रस्ताव में माइक्रो एसडीजेड का स्पष्ट उल्लेख है। योजना के तहत जमीन के 75 फीसद हिस्से मुख्य गतिविधि (कोर एक्टिविटी) व 25 फीसद पर आवासीय, कामर्शियल गतिविधियों की अनुमति थी। वहीं मुख्य गतिविधि वाले हिस्से में औद्योगिक इकाई, संस्थान, आइटी समेत सात तरह की गतिविधि की इजाजत थी। लेकिन, बिल्डरों ने आवासीय व कामर्शियल हिस्से पर बुकिंग की। जिन भूखंडों को मुख्य गतिविधि में औद्योगिक इकाई के लिए आवंटित कराया गया था, उस हिस्से पर भी शैक्षिक संस्थान बना दिए गए। इसके तहत कुल 16 भूखंड आवंटित किए गए। बिल्डरों को सस्ती दरों पर जमीन देने का आधार क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना बताया गया। लेकिन, अभी तक एक भी औद्योगिक इकाई नहीं लगी है।

इस तरह अंजाम दिया गया घोटाला

जमीन अधिग्रहण करने पर किसानों को 850 रुपये प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा दिया गया था। अधिग्रहण के बाद प्राधिकरण जमीन के 50 फीसद हिस्से पर ही योजनाएं निकाल पाता है। शेष 50 फीसद जमीन सड़क, नाली, सीवर, पार्क, सामुदायिक केंद्र, बिजली स्टेशन आदि सुविधाओं में इस्तेमाल हो जाती है। इस तरह किसानों को दिए गए मुआवजे का खर्च दोगुना यानि 1700 रुपये तक पहुंच जाता है। जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई में प्राधिकरण, प्रशासन से लेकर शासन की अनुमति लेने में प्रति वर्गमीटर तीन सौ रुपये तक खर्च होता है। इसे मिलकर जमीन की कीमत दो हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर तक हो जाती है। जमीन पर वाह्य विकास पर एक हजार रुपये का खर्च जोड़ लें तो कीमत तीन हजार रुपये बैठती है। प्राधिकरण को जमीन आवंटन के समय इससे चार से पांच गुना अधिक दर पर बेचनी चाहिए थी, लेकिन बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए 1500 रुपये प्रति वर्ग मीटर पर जमीन बेच दी गई। इससे प्राधिकरण को सीधे-सीधे 600 करोड़ का नुकसान हुआ।

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