जनता के ‘भरोसे’ पर अखबारों का ‘छल’

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जनता के ‘भरोसे’ पर अखबारों का ‘छल’ News paper fake confidence public domin जनता के 'भरोसे' पर अखबारों का 'छल
योगेश भट्ट
देहरादून सरकारें तो जनता से अक्सर ‘छल’ करती ही हैं लेकिन अखबार से यह उम्मीद नहीं की जाती । अखबार भी अगर छल पर उतर आयें तो फिर पर भरोसा किया जाए ? आज छल की खबर दरअसल अखबारों की ही है। उन अखबारों की जिन्हें हर सुबह कम से कम आज भी पहली बार गीता, कुरान, बाइबिल की तरह पढा जाता है। कहा जाता है कि अखबार ‘ट्रैंड सेटर’ हुआ करते हैं, ‘पब्लिक वाइस’ हुआ करते हैं, ‘ओपिनियन मेकर’ होते हैं। मौजूदा परिवेश में ऐसा है या नहीं, इसमें शक तो पूरा है लेकिन फिलवक्त मान्यता तो यही है कि ‘अखबार’ एक ‘पावर’ है।

तभी तो आज भी सरकारें अखबारों के आगे ‘नतमस्तक’ नजर आती हैं। लेकिन यह क्या? अखबार को क्या होता जा रहा है? इसे प्रबंधन की नासमझी कहा जाए, चालबाजी समझा जाए या फिर दुस्साहस, कि ट्रैंड सेटर अखबार आज खुद ‘ट्रैंड’ का शिकार हो रहे हैं। यह कोरी कल्पना नहीं हकीकत है कि बाजार में आज एक ही नाम के दो-दो अखबार हैं l दो तरह के दैनिक जागरण दो तरह का अमर उजाला ,है ना चौंकाने वाली बात! एक दो रुपये वाला और दूसरा चार रुपये वाला, दोनो असली! दोनों अखबार एक साथ देखने पर जेहन में पहला सवाल यही उठता है कि यह अखबार है या कोई खाने की थाली या कोई और बाजारू सामान ? जिस तरह ढाबों में एक ही खाना दो अलग-अलग थालियों में स्पेशल और डीलक्स थाली के नाम से बेचा जाता है, मेडिकल स्टोर में एक ही कंपनी की दवा अलग-अलग नामों से बेची जाती है,

एक ही फैक्ट्री का जूता अलग-अलग नाम से अलग-अलग दाम पर बेचा जाता है, क्या ठीक उसी तर्ज पर ये दो बड़े अखबार भी बाजार में हैं ? यकीं नहीं होता, कीमत के लिहाज से देखा जाए तो अखबार की असल कीमत तो उसके मूल्य से कहीं ज्यादा होती है l कीमत से फायदे का तो कोई प्रश्न ही नहीं बनता l जहां तक फर्क का सवाल है तो गौर से देखने पर फर्क इतना है कि दो रुपये वाले दैनिक जागरण पर छोटा सा ‘i-next ’ लिखा है और अमर उजाला पर ‘SELECT’। दोनों ही दो रुपये वाले अखबार 12 पन्नों के हैं और चार रुपये वाले में 18 पन्नों के । चार रुपये वाले अखबार में स्वाभाविक रुप से खबरों की संख्या ज्यादा है। तकनीकी पक्ष यह है कि दोनों अखबारों की प्रिंटलाइन और आरएनआई संख्या तक एक है। अब सवाल उठता है कि क्या यह सही तरीका है? जब एक ही आरएनआई नंबर पर किसी अखबार के दो अलग-अलग संस्करण नहीं छप सकते हैं तो फिर दो अलग-अलग अखबार कैसे छप सकते हैं?

वह भी एक ही शहर में? क्या यह पाठकों के साथ, विज्ञापनदाताओं के साथ छल नहीं है? सवाल तो यह भी है कि आखिर इतने बड़े अखबारों को ऐसा करने की क्या जरूरत आन पड़ी? जाहिर है यह किसी न किसी के फायदे के लिए किया गया होगा, लेकिन यह लाभ किस कीमत पर? उस ‘भरोसे’ की कीमत पर, जो भरोसा अखबार को बाजार की वस्तु से अलग दर्जा देता है। अगर सिर्फ यह मुनाफे का गणित है तो यह बहुत बड़ी घोखाधड़ी है। भले ही पत्रकारिता के मूल्यों में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है, बावजूद इसके अखबारों को आज भी बौजार की वस्तु के तौर पर नहीं देखा जाता।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अखबारों का यह खुला छल किसी को दिखाई नहीं देता। कोई आवाज क्यों नहीं उठाता? इस पर नजर रखने के लिए जो एजेंसियां हैं, आखिर वे क्या कर रही हैं? क्या अखबारों के इस मनमाने रवैये पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी किसी की नहीं? जिन जिम्मेदार लोगों को यह खेल साफ-साफ दिख रहा है, उन्होंने क्या इसलिए आंखें बंद की हुई हैं क्योंकि ये बड़ी प्रसार संख्या वाले अखबार है? दरअसल हकीकत यह है कि इस खेल में जनता से लेकर पूरे सिस्टम की आंखों में धूल झोंका जा रहा है। पूरा खेल दरअसल सर्कुलेशन और विज्ञापन के गणित का है, मोटे मुनाफे का है । सिद्धांतो और कायदे की इसमें कोई परवाह नहीं l

जरा फर्ज कीजिए, यदि कोई छोटा अखबार या संस्थान इतने खुलेआम ऐसा खेल करता तो क्या होता? क्या उसे भी इन बड़े अखबारों की तरह बख्श दिया जाता? क्या उसका आरएनआई नंबर निरस्त नहीं हो चुका होता? क्या उसे फर्जीवाड़े के आरोप में ब्लैकलिस्टेड नहीं कर दिया जा चुका होता? सच बात ये है कि बदलते दौर में अखबारों को अपने वजूद का संकट साफ नजर आने लगा है। इसी लिए अखबारों में, ‘बरकरार है प्रिंट मीडिया की धमक’ ‘डिजिटल मिडिया के बढ़ते प्रसार के बावजूद प्रिंट का जलवा बरकरार’ टाइप खबरें छप रही हैं। यदि अखबार ऐसी खबरें छापने लगें,जिनमें निकट भविष्य में प्रिंट मीडिया को कोई खतरा नहीं होने की बातें लिखी हों, तो वह यह दिखाता है कि वास्तव में प्रिंट मीडिया खतरा महसूस कर रहा है। यह जो प्रपंच है, वो इसी का सबब है।

लेकिन हम शायद यह भूल रहे हैं कि अखबार का स्वामी कोई भी हो, अगर अखबार कोई सम्पत्ति है तो उसकी असल मालिक पब्लिक ही है l सवाल यह है कि जो पत्रकारिता का पेशा सच्चाई, ईमानदारी और जनपक्षधरता का प्रतीक माना जाता है, जो अखबार पत्रकारिता का ध्वजवाहक कहा जाते हैं, क्या उसे यह शोभा देता है? व्यक्तिगत तौर पर मैं खुद इससे आहत हूं, दोनों ही अखबार लंबे समय तक मेरे कर्मस्थल रहे हैं l इसिलिए एक आदार भाव भी है ,आज यकीन नहीं होता कि जिन आखबारों के लिए इतने सालों तक ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ सेवा दी, वे संस्थान आज सिर्फ ‘मुनाफे’ के लिए इतना गिर सकते हैं।

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