नारायण दत्त तिवारी का राजनैतिक सफरनामा और जीवन से जुडी खास बातें

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नारायण दत्त तिवारी का राजनैतिक सफरनामा और जीवन से जुडी खास बातें :narayan datt tiwari politics indian uttar pradesh uttarakhand


देहरादून चारबार उत्तर प्रदेश और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी का लम्बा राजनैतिक इतिहास रहा है अकेले उत्तराखंड में अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले नारायण दत्त तिवारी का यहाँ से लम्बा राजनैतिक सफर रहा है अपने जीवन काल में उनका कई तरह के विवादों से भी नाता रहा लेकिन इसके बाद भी उनकी राजनैतिक पारी को उत्तराखंड के राजनैतिक लोगो से लेकर हर वर्ग के वयक्ति याद किये बिना नहीं रह पाते उत्तराखंड में सिडकुल का निर्माण से लेकर यहाँ की आर्थिक विकास की सोच आज भी लोगो को रोजगार उपलब्ध करवा रही है

नारायण दत्त तिवारी का अपना राजनैतिक जीवन से लेकर कार्यकाल

नारायण दत्त तिवारी का जन्म 1925 में नैनीताल जिले के बलूती गांव में हुआ था। तब न उत्तर प्रदेश का गठन भी नहीं हुआ था। भारत का ये हिस्सा 1937 के बाद से यूनाइटेड प्रोविंस के तौर पर जाना गया और आजादी के बाद संविधान लागू होने पर इसे उत्तर प्रदेश का नाम मिला। तिवारी के पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अधिकारी थे। जाहिर है तब उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी रही होगी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर पूर्णानंद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। नारायण दत्त तिवारी शुरुआती शिक्षा हल्द्वानी, बरेली और नैनीताल में हुई। यकीनन अपने पिता के तबादले की वजह से उन्हें एक से दूसरे शहर में रहते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की। अपने पिता की तरह ही वे भी आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। 1942 में वह ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ नारे वाले पोस्टर और पंपलेट छापने और उसमें सहयोग के आरोप में पकड़े गए। उन्हें गिरफ्तार कर नैनीताल जेल में डाल दिया गया। इस जेल में उनके पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से ही बंद थे। 15 महीने की जेल काटने के बाद वह 1944 में आजाद हुआ। बाद में तिवारी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने राजनीतिशास्त्र में एमए किया। उन्होंने एमए की परीक्षा में विश्वविद्याल में टाप किया था। बाद में उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। 1947 में आजादी के साल ही वह इस विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गए। यह उनके सियासी जीवन की पहली सीढ़ी थी। आजादी के बाद 1950 में उत्तर प्रदेश के गठन और 1951-52 में प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) सीट से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर हिस्सा लिया। कांग्रेस की हवा के बावजूद वे चुनाव जीत गए और पहली विधानसभा के सदस्य के तौर पर सदन में पहुंच गए। यह बेहद दिलचस्प है कि बाद के दिनों में कांग्रेस की सियासत करने वाले तिवारी की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी से हुई। 431 सदस्यीय विधानसभा में तब सोशलिस्ट पार्टी के 20 लोग चुनकर आए थे। कांग्रेस के साथ तिवारी का रिश्ता 1963 से शुरू हुआ। 1965 में वह कांग्रेस के टिकट पर काशीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुने गए और पहली बार मंत्रिपरिषद में उन्हें जगह मिली। कांग्रेस के साथ उनकी पारी कई साल चली। 1968 में जवाहरलाल नेहरू युवा केंद्र की स्थापना के पीछे उनका बड़ा योगदान था। 1969 से 1971 तक वे कांग्रेस की युवा संगठन के अध्यक्ष रहे। एक जनवरी 1976 को वह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह कार्यकाल बेहद संक्षिप्त था। 1977 के जयप्रकाश आंदोलन की वजह से 30 अप्रैल को उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। तिवारी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वह अकेले राजनेता हैं जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद वे उत्तरांचल के भी मुख्यमंत्री बने। केंद्रीय मंत्री के रूप में भी उन्हें याद किया जाता है। 1990 में एक वक्त ऐसा भी था जब राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी दावेदारी की चर्चा भी हुई। पर आखिरकार कांग्रेस के भीतर पीवी नरसिंह राव के नाम पर मुहर लग गई। बाद में तिवारी आंध्रप्रदेश के राज्यपाल बनाए गए लेकिन यहां उनका कार्यकाल बेहद विवादास्पद रहा।

राजनैतिक जीवन का सफरनामा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी को आज उस समय बड़ा झटका लगा, जब दिल्ली हाईकोर्ट में उनके रक्त के नमूने संबंधी डीएनए रिपोर्ट सार्वजनिक किया गया और उस रिपोर्ट के अनुसार पितृत्च वाद दायर करने वाले रोहित शेखर तिवारी ही एनडी तिवारी के बेटे हैं।

दिल्ली में रहने वाले 32 साल के रोहित शेखर तिवारी का दावा है कि एनडी तिवारी ही उसके जैविक पिता हैं और इसी दावे को सच साबित करने के लिए रोहित और उसकी मां उज्ज्वला तिवारी ने 4 साल पहले यानी 2008 में अदालत में एन डी तिवारी के खिलाफ पितृत्व का केस दाखिल किया था। अदालत ने मामले की सुनवाई की और अदालत के ही आदेश पर पिछले 29 मई को डीएनए जांच के लिए एनडी तिवारी को अपना खून देना पड़ा था। देहरादून स्थित आवास में अदालत की निगरानी में एनडी तिवारी का ब्लड सैंपल लिया गया था। कुछ दिनों पहले हैदराबाद के सेंटर फोर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायएग्नोस्टिक्स यानी सीडीएफडी ने ब्ल़ड सैंपल की जांच रिपोर्ट अदालत को सौंप दी।

सीडीएफडी की इस सील्ड रिपोर्ट में एनडी तिवारी के साथ रोहित शेखर तिवारी और रोहित शेखर तिवारी की मां उज्ज्वला तिवारी की भी डीएनए टेस्ट रिपोर्ट शामिल हैं। हालांकि एनडी तिवारी नहीं चाहते कि उनकी डीएनए टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक हो इसलिए उन्होंने अदालत में इसे गोपनीय रखने के लिए याचिका भी दी थी लेकिन अदालत इसे खारिज कर दिया और इसे खोलने का आदेश जारी कर दिया।

मीडिया की सुर्खी वाली खबर

राख से फिर जी उठने की यह कांग्रेसी स्टाइल है. नारायण दत्त तिवारी 1991 में प्रधानमंत्री की कुर्सी से एक चुनाव भर दूर थे. तिवारी तो यही मानते हैं, ‘नरसिंह राव ने चुनाव नहीं लड़ा, वे पीएम बन गए. मैंने चुनाव लड़ा, संयोग से 5,000 वोट से हार गया और पीएम नहीं बन पाया. हार भी सिर्फ इसलिए हुई कि अभिनेता दिलीप कुमार के चुनाव प्रचार के बाद विरोधियों ने इस बात पर हंगामा खड़ा कर दिया कि यूसुफ खान ने अपना नाम दिलीप कुमार क्यों रखा.’ मुस्लिम अभिनेता के नाम बदलने की मजबूरी का मुद्दा तिवारी की राह का रोड़ा बन गया और उनके मन में उस हार की कसक अब तक है.

प्रधानमंत्री बनने का उनका ख्वाब भले ही पूरा नहीं हो पाया पर सियासत में उनकी दखल कभी कम नहीं हुई. 18 अक्तूबर, 1925 को नैनीताल के बलूती गांव में पैदा हुए तिवारी आजादी के समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष थे. तिवारी संभवतः देश के इकलौते बड़े नेता हैं जो भारत के गणराज्‍य बनने के समय से राजनीति में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश में चार बार और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तथा केंद्र में लगभग हर महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री रहे तिवारी अतीत के पिंजरे में कैद होने वालों में नहीं हैं.

किसी भारतीय व्यक्ति की औसत आयु (65 साल) के बराबर राजनीति में बिताने के बाद अब जबकि वे खुद खड़े नहीं हो पाते और मिक्सी में पिसा हुआ खाना खाते हैं, उनका राजनैतिक पुनर्जन्म हुआ है. हैदराबाद राजभवन सेक्स स्कैंडल और कथित पुत्र विवाद के बाद राजनैतिक पंडितों ने उनका सियासी मर्सिया पढ़ दिया था. उस समय शायद ही किसी ने सोचा था कि देखते-ही-देखते तिवारी फिर से मौजूं हो जाएंगे. और वे मौजूं हुए भी तो किस अंदाज में.

देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में उनकी 1 नंबर की कोठी फिर से कांग्रेसी राजनीति का केंद्र बन गई है. उन्होंने 2002 के बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन 2012 में कम-से-कम 7 उम्मीदवारों को कांग्रेस से चुनाव लड़ाया. उन्होंने हल्द्वानी, रामनगर, काशीपुर सहसपुर, विकासनगर, जसपुर, रुद्रपुर और गदरपुर में कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए सभाएं कीं और रोड शो करके वोट मांगे. वे हेलीकॉप्टर से जगह-जगह गए. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में लगभग दो दर्जन सीटों पर उनके प्रचार की मांग हुई थी, लेकिन सेहत की वजह से वहां प्रचार कर पाना तिवारी के लिए संभव नहीं हो सका.

उनकी हड्डी-पसली और पाचन तंत्र भले ही कमजोर पड़ गए हों पर उनकी रग-रग में राजनीति है और उनका दिमाग अब भी दिग्गज नेताओं की तरह काम करता है. प्रचार के दौरान तिवारी ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि वे एक बार फिर, लेकिन सिर्फ ढाई साल के लिए, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन सकते हैं. ढाई साल क्यों? इसलिए कि ढाई साल बाद वे 90 के हो जाएंगे. मतगणना से एक हफ्ता पहले अपनी कोठी में इंडिया टुडे से बातचीत करते हुए तिवारी कहते हैं, ‘उम्र को देखते हुए अब बागडोर नहीं संभालनी, सलाह देनी है.’

लेकिन उनके कमरे में मौजूद उनके समर्थक इससे सहमत नहीं हैं. युवा कांग्रेस के नेता रहे अनिल कुमार शर्मा कहते हैं, ‘राज्‍य को उनके मार्गदर्शन की जरूरत है. अगले मुख्यमंत्री तिवारी जी ही होंगे.’ तिवारी के गैर-राजनैतिक संगठन निरंतर विकास संपर्क समिति के अध्यक्ष और उद्योगपति भारत शर्मा भी चाहते हैं कि तिवारी कम-से-कम छह महीने के लिए मुख्यमंत्री जरूर बनें. कभी कांग्रेसी अखबार नेशनल हेराल्ड के विशेष संवाददाता रहे तिवारी पत्रकार की तरह सब सुनते हैं. दिग्गज नेता की तरह उनकी बातों का वे न तो समर्थन करते हैं, न विरोध.

वैसे, तिवारी इन दिनों बेताबी से उत्तराखंड चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं. मतदान के लगभग एक महीने बाद भी नतीजा न आने से वे नाखुश हैं. वे कहते हैं कि नतीजा इतने समय तक रोकना पड़ा, यानी कोई-न-कोई कमी है. वे व्यंग्य में कहते हैं, ‘न खाता न बही, जो कुरैशी (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) कहें, वही सही.’

तमाम विवादों और उम्र के आखिरी पड़ाव पर होने के बावजूद आखिर वह क्या खास बात है जो कांग्रेस की राजनीति में तिवारी को अतीत नहीं बनने देती? ऐसे एक विवाद के बाद कई नेताओं का राजनैतिक जीवन खत्म होता देखा गया है. कर्नाटक विधानसभा में पोर्न देखने वाले मंत्रियों की वापसी आसान नहीं होगी. ऐसी ही एक सच्ची या झूठी सेक्स सीडी के बाद बिहार में एक सांसद का राजनैतिक करियर खत्म-सा हो गया. तिवारी के टिके रहने की सबसे लोकप्रिय व्याख्या यह है कि वे विकास पुरुष और सौम्य नेता हैं. लेकिन देहरादून में रहने वाले हिंदी लेखक और फेलो बनकर शिमला के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज (आइआइएएस) जा रहे ओम प्रकाश वाल्मीकि इसके जवाब में बाल ठाकरे का एक पुराना बयान दोहराते हैं, ‘बड़े लोग गलत काम नहीं करते.’ वे कहते हैं कि तिवारी की सामाजिक पृष्ठभूमि भी उनके पक्ष में काम करती है. वाल्मीकि याद करते हैं, ‘प्रधानमंत्री पद के बेहद करीब पहुंचे दलित नेता जगजीवन राम किस तरह अपने बेटे पर लगे स्कैंडल के आरोपों के बोझ तले दब गए थे.’

लेकिन पद्मश्री से सम्मानित देहरादून निवासी कवि और लेखक लीलाधर जगूड़ी इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि भारतीय लोक परंपरा में किसी को भी यौन आरोपों की वजह से खारिज नहीं किया जाता. तिवारी पर लगे आरोप सही हैं तो भी क्लासिकल माइथोलॉजी के हिसाब से उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है. जगूड़ी कहते हैं, ‘कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में तिवारी को उतारकर उन पर लगे आरोपों को धो दिया है.’

कांग्रेस के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस के चुनाव जीतने की हालत में मुख्यमंत्री पद के दावेदार यशपाल आर्य कहते हैं कि कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में राज्‍य का चुनाव लड़ा है. हालांकि आर्य 2002 से 2007 के बीच तिवारी के मुख्यमंत्री होने के दौर को याद करते हुए कहते हैं कि ‘उस दौरान राज्‍य का सर्वाधिक विकास हुआ.’ तिवारी के विरोधी भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते. तिवारी भी 2009 के आखिर में हुए राजभवन कांड को याद करना नहीं चाहते, ‘यह सब कुछ नहीं है. घटनाएं घटित होती रहती हैं, उन बातों पर क्या कहा जाए.’

तिवारी की गोरी-चिट्टी चमड़ी और जबरदस्त याददाश्त का राज हैः भरपूर नींद. वे इस उम्र में भी अत्यंत चैतन्य हैं और टाइम मैगजीन और इंडिया टुडे की कॉपी फाइल करवाकर रखते हैं, जिन पर गुलाबी, हरी और पीली पर्चियां लगी हैं. उन्हें यह बात सालती है कि ब्लैकबेरी, सैमसंग, सोनी और निकॉन जैसी कंपनियां भारत में क्यों नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘भारत को चीन, जापान और कोरिया के बराबर खड़ा होना चाहिए.’ वे दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत के पिछड़ने से चिंतित हैं. तिवारी के कैनवस पर उत्तराखंड नहीं, देश है. कभी योजना आयोग में मनमोहन सिंह के बॉस रह चुके तिवारी उत्तर प्रदेश को छोटे राज्‍यों में बांटने के बारे में कहते हैं, ‘छोटे भाई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जरूर सोचना चाहिए.’

उत्तराखंड में कहते हैं कि जिस पर गीत बन गया वह निबट गया. तिवारी पर नरेंद्र सिंह नेगी के लोकगीत की सीडी नौछमी नारेणा लोगों के बीच सुपरहिट रही. लेकिन लगता है कि तिवारी गानों की सीडी ही नहीं, हैदराबाद राजभवन की सीडी भी झेल गए.

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