प्रणब मुखर्जी की किताब टर्बुलेंट इयर्स को लेकर पटियाला हाउस अदालत में सिविल सूट दाखिल

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प्रणब मुखर्जी की किताब टर्बुलेंट इयर्स को लेकर पटियाला हाउस अदालत में सिविल सूट दाखिल
पटियाला भारत के राष्ट्रपति प्रणब के खिलाफ पटियाला हाउस अदालत में सिविल सूट दाखिल हुआ है। सिविल सूट में प्रणब मुखर्जी की किताब टर्बुलेंट इयर्सजी  1980-1996 के कुछ अंशों पर आपत्ति जताते हुए किताब से उन अंशों को हटाये जाने की मांग की गई है।
सिविल सूट में राष्ट्रपति को नाम से प्रतिवादी बनाया गया है। प्रणब मुखर्जी की किताब में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के संबंध में की गई टिप्पणियों पर दाखिल सूट में आपत्ति जताई गई है। याचियों ने मांग की है कि अदालत किताब के उपरोक्त अंशों को गलत और हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला घोषित करें और साथ ही प्रणब मुखर्जी को आदेश दिया जाए कि वे किताब के उन आपत्तिजनक अंशों को हटाएं तथा उस बारे में पब्लिक नोटिस जारी करें।
किताब के आपत्तिजनक अंश हटाए बगैर उसकी बिक्री करने पर रोक लगाई जाए। यह सूट लखनऊ और फैजाबाद के रहने वाले चार लोगों की ओर से सोमवार को उनके वकील हरि शंकर जैन और विष्णु शंकर जैन ने दाखिल किया। वकील विष्णु ने बताया कि सोमवार को दोपहर बाद पटियाला हाउस अदालत में राष्ट्रपति प्रणब मुर्खजी के खिलाफ सिविल सूट दाखिल कर दिया गया और इस सूट पर मंगलवार को अदालत सुनवाई कर सकती है। दाखिल सूट में प्रणब मुखर्जी के अलावा किताब के प्रकाशक रूपा पब्लिकेशन को भी पक्षकार बनाया गया है।
सूट में कहा गया है कि प्रणब मुर्खजी की किताब की पृष्ठ संख्या 128-129 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के गलत फैसलों का जिक्र किया गया है जिसमें यह कहा गया है कि 1 फरवरी 1986 को राम जन्मभूमि मंदिर खुलवाना उनका गलत फैसला था। लोग महसूस करते हैं कि इस काम को टाला जा सकता था। याचियों का कहना है कि किताब में दिये गये ये अंश सही नहीं हैं क्योंकि राम जन्मभूमि का ताला जिला जज फैजाबाद के आदेश से खुला था। कहा गया है कि किताब के लेखक ने लोगों को ये बताने की कोशिश की है कि मंदिर का ताला खुलवाने का न्यायिक आदेश प्रधानमंत्री राजीव गांधी की फैसला लेने की चूक थी। किताब में यह बताने की कोशिश की गई है कि भारत में न्यायिक आदेश राजनैतिक और प्रशासनिक आकाओं के दबाव में होते हैं। इस टिप्पणी से आम जनता की निगाह में न्यायपालिका की छवि खराब होती है।

यह एक तरह से न्यायालय की अवमानना है। इसी तरह किताब की पृष्ठ संख्या 151 से 155 में लेखक ने 6 दिसंबर 1992 की घटना का जिक्र करते हुए विवादित ढांचे को बाबरी मस्जिद कहा है। किताब में बीबीसी के रिर्पोटर मार्क टुली की 5 दिसंबर 2002 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। याचियों का कहना है कि लेखक का इस तरह हिन्दुओं के खिलाफ सीधी टिप्पणीं करना और खुले तौर पर बाबरी मस्जिद का पक्ष लेना यह दर्शाता है कि ढहाया गया ढांचा मस्जिद थी और बर्दाश्त न किये जाने वाले उस कार्य के लिए हिन्दू और हिन्दू संगठन जिम्मेदार थे। लेखक द्वारा की गई इन टिप्पणियों से पक्षकारों के बीच सुप्रीमकोर्ट में लंबित मुकदमे पर विपरीत असर पड़ता है। याची भगवान राम के भक्त हैं वे इन गलत तथ्यों से प्रभावित हुए हैं।
लेखक जो कि राष्ट्रपति के जिम्मेदार पद पर आसीन हैं, के द्वारा की गई एक तरफा टिप्पणियों या तथ्यों से उन्हें दुख और आघात हुआ है। लोग राष्ट्रपति की किताब में कही गई बातों को सही समझेंगे जबकि ये ऐतिहासिक तथ्यों और मौजूद न्यायिक रिकार्ड के खिलाफ है। कहा गया है कि प्रणब मुखर्जी सक्रिय राजनीति में रहे हैं और सरकार से भी जुड़े रहे हैं उन्हें अयोध्या विवाद के बारे सब कुछ पता है। ऐसे में उन्हें अयोध्या के विवादित ढांचे को बाबरी मस्जिद नहीं घोषित करना चाहिए था। उन्होंने सारी जानकारी होने के बाद लिख दिया कि बाबरी मस्जिद के ढहने से सारे हिन्दुओं का सिर शर्म से झुक गया।

उन्होंने राजनैतिक सोच के चलते ऐतिहासिक तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया को देखे बगैर इस तरह की एक तरफा बात की है। हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने 30 सितंबर 2010 को बहुमत से दिये गये फैसले में कहा है कि ढांचा निर्माण से पहले उस जगह अयोध्या में हिन्दू मंदिर था।

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