तब किच्छा का किया नहीं अच्छा, अब मसीहा बनने की हसरत

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तब किच्छा का किया नहीं अच्छा, अब मसीहा बनने की हसरत
-अर्श-
रुद्रपुर । भारत में नौकर शाहों के सियासत प्रवेश का सिलसिला काफी पुराना है। देश में ऐसे कई नौकर शाह हुए जिन्होंने न केवल सियासत में प्रवेश किया बल्कि राजनीति में एक लम्बी पारी खेलकर अपने आप को साबित भी किया। राजनीति में कदम रखने वाले नौकरशाहों को आमतौर पर ‘भाव’ इसलिए मिल जाता है, क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि उच्च शिक्षित होने के कारण ये समझदारी भरे निर्णय लेंगे और जनविकास के कार्यक्रमों की बेहतर रूपरेखा तैयार कर सकेंगे। बावजूद इसके कई बार मतदाता नौकरशाहों की दावेदारी को सिरे से खारिज भी कर देते हैं। कारण दावेदार का स्थानीय और स्वच्छ छवि वाला न होना। हालांकि उपरोक्त दोनों अहर्ताएं किसी उम्मीदवार के लिये कोई संविधन निर्धारित मानदण्ड नहीं है, पिफर भी विगत कुछ दशकों से जागरूक हुआ देश का मतदाता उपरोक्त दोनों कसौटियों पर अक्सर ही उम्मीदवारों को परीक्षित करने लगा है। कदाचित यही कारण है कि देश में होने वाले हर छोटे-बड़े चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी का ‘कार्ड’ खेला ही जाता है। स्थानीय प्रत्याशी का तात्पर्य आजकल केवल चुनावी क्षेत्रान्तर्गत रहवास भर से नहीं लिया जाता, वरन अब इसमंे उम्मीद्वार के क्षेत्रा विशेष में सक्रिय रहने को भी सम्मिलित किया जाने लगा है। आशय यह कि चुनाव में अब वह पहले वाला ‘भेड़िया ध्सान’ नहीं रह गया, जिसके वशीभूत जनता आंख मूंद कर वोट कर दिया करती थी। अब तो वह वोट देते समय दुःख-सुख में हर वक्त साथ खड़े रहने वाला अपने बीच का कोई उम्मीद्वार तलाशती है। लिहाजा किसी चुनाव में और कोई मुद्दा जोर पकड़े या न पकड़े, स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा अवश्य ही जोर पकड़ता है। एक ऐसे स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा जो क्षेत्रा की जनता का उलाहना, झिड़की, दुलार एवं दुत्कार आदि को झेलते हुए हर लम्हा उसके बीच खड़ा रहे। कहने की जरूरत नहीं कि जैसे-जैसे सूबे के विधनसभा चुनाव की अध्सिूचना जारी होने की घड़ी नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे विभिन्न विधनसभा क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीद्वार की मांग जोर पकड़ती जा रही है। इस क्रम में यदि सूबे के ऊध्म सिंह नगर जिले का संदर्भ लें, तो जनपद की किच्छा विधनसभा स्थानीय प्रत्याशी के बुखार से बुरी तरह तप रही है। किच्छा विधनसभा क्षेत्रा के इस बुखार पर थर्मामीटर का ‘पारा’ उसी दिन से चढ़ना शुरू हो गया था, जब सूबे के पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा ने पंतनगर-किच्छा सीट से विधनसभा चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की थी और विगत दिनों केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्राी के किच्छा प्रवास पर हुए जूतमपैजार के बाद से तो यह अब अपने ‘पीक’ पर है। और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कभी सूबे के सबसे बड़े नौकरशाह रहे व्यक्ति का कुछ ‘वजन’ तो होगा ही।

बेहतर होता कि पूर्व मुख्य सचिव पहले करते जन सेवा फिर मांगते जनता से आशीर्वाद

ऐसे किसी व्यक्ति को जनता भले ही तरजीह न दे, पर अन्य दावेदारों को अपना हिसाब गड़बड़ाता नजर आयागा ही। सो समीकरण संतुलित करने के लिये इसकी कोई ‘काट’ भी ढूंढी जायेगी, जो कि निश्चित रूप से स्थानीय और स्वच्छ छवि ;भ्रष्टाचार के आरोपों से परेद्ध वाले प्रत्याशी मांग के अलावा कोई और नहीं हो सकती। वैसे मुख्य सचिव की ऐसे घेराबंदी एक तरीके से जायज भी है, क्योंकि विधनसभा चुनाव के ऐन पहले जागा उनका ‘किच्छा-प्रेम’ अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है, सवालों के सैलाब की एक नन्हीं-सी बूंद यह है कि श्री शर्मा को किच्छा विधनसभा एवं उसकी जनता की दशा-दिशा बदलने की तब क्यों नहीं सूझी, जब मौका भी था और दस्तूर भी? अर्थात जब वे प्रधन मुख्य सचिव थे। बड़ी बात तो यह कि उस वक्त श्री शर्मा सूबे के मुखिया के विश्वस्त और करीबी भी थे। लिहाजा उस समय अगर वे चाह लेते तो किच्छा विधनसभा का कायाकलप करना उनके ‘बांये हाथ का खेल’ था। पर जाने क्यों तत्कालीन मुख्य सचिव को उस समय यह रौशन ख्याल नहीं आया? वाह री, विडम्बना! जब व्यक्ति को सच्चा लोक सेवक बन कर दिखाना चाहिए था, तब तो वह नौकरशाह का ‘चोला’ पहने था और अब जबकि बूते में कुछ कर सक पाना नहीं रहा, तो साहब मसीहा बनने चले। अरे हुजूर! सियासत में आदमी जो बोता है वही काटता है। मलाई खाने ;विधयक निर्वाचित होनेद्ध से पहले गौ माता ;जनताद्ध की सेवा भी करनी पड़ती है। बेहतर होता कि पहले आप जन सेवा करते उसके बाद जनता से आशीर्वाद मांगते, लेकिन आप तो पहले ही।

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