कैलाश खैर बाबा केदारनाथ के लिए बिना करोड़ो लिए गा लेते गाना

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कैलाश खैर बाबा केदारनाथ के लिए बिना करोड़ो लिए गा लेते गाना

देहरादून उत्तराखंड राज्य जहा आपदा ने इस राज्य की कमर तोड़ दी वही ये राज्य अपनी बेचारगी का बोझ उठा कर अपनी कदम ताल देश के दूसरे राज्यो में शामिल कर पाया केदारनाथ को अपनी पटरी पर लाने के लिए कई सालो का सफर तय करना पड़ता लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत के होसलो की उड़ान ने उत्तराखंड को अपनी जगह फिर से कई गुना आगे कर दिया। और आज उत्तराखंड केदारनाथ से लेकर आपदा के सभी जगहों पर अपनी तरफ पर्यटको को ला रहा है लेकिन इन सब के बाद भी अगर अच्छा होता केदारनाथ और आपदा से टूट चुके राज्य के लिए कैलाश खैर जैसे कलाकार बिना करोड़ो लिए बाबा केदारनाथ के लिए फिल्म से लेकर अपनी आवाज़ को निकाल लेते जिस का सन्देश राज्य की जनता के साथ साथ देश की जनता के बीच भी अलग तरह से जाता सोशल मीडिया पर लगातार इस बात का विरोध तेज़ हो गया है निचे फेस बुक से लिया गया एक पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बन गया है ये पत्र पत्रकार वेद उनियाल के फेस बुक वाल से लिया गया है।

सुफियाना कैलाश खैर के नाम खुला पत्र
हमें सच्चाई जाननी है। क्यों उठ रही है ये बातें कि रात का अकेला गायन, शायद एक अप्रासंगिक वीडियो, करोड का । वो भी गाना केवल ओंठ हिलाकर। क्या दस करोड स्वाहा।

1- बहुत चर्चा है कि तुमने केदारनाथ में एक शाम के आयोजन के करोड रुपए उत्तराखंड से ले लिए। हो सकता है कि आप्रसंगिक समय में कोई विडियो भी बन रहा हो। खैर यह आपसे नहीं पूछा जाएगा कि चारों ओर से विपत्ति में घिरे राज्य को किसी वीडियो फिल्म की जरूरत हैं। पर चर्चा है कि तुम तो चालीस लाख और मांग रहे थे। लेकिन बाद में उत्तराखंड की अभागी जनता पर रहम कर दिया । इस देश में जहां किशोरी अमोणकर, भीमसेन जोशी , रविशंकर जैसी संगीत की महान हस्तियां पांच लाख रुपए तक ठहर जाते थे, तुमने अपनी कीमत करोड रुपए आंकी। माइकल जैक्सन भी भारत आया। शकीरा भी अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में तीस लाख के आसपास ठहर जाती हैं। तुमने इस अभागे उत्तराखंड से इतनी बडी रकम कैसे ले लिए। ऊपर से लिप्सिंग करके केवल दो गाने गाए। क्या सांठगांठ है, क्या छद्म है। बताओ क्या सचमुच तुम्हारी जेब में कितना पैसा आया या खेल कुछ और है। और दस करोड़ क्या अगर एक करोड भी तुम्हें मिला तो तुम जैसे बी ग्रेड के कलाकार को यह पैसा कैसे मिला। क्यों मिला। और तुमने गाया क्या। तुमने बनाया क्या। और अगर ये बातें कल्पित हैं तो सच क्या है बताओ। उत्तराखंड के जनमानस में ये सवाल तैर रहा है। सच क्या है। बताओ। वह सच्चाई जानना चाहता है।
2- तुमने सुफियाना गाने से अपना कैरियर शुरु किया था। तब लगा था कि सुब्बालक्ष्मी और हरिओम शरण की आवाज जैसी पवित्रता में कोई और बंदा आय़ा है जो सुफियाना गा रहा है। लगन से गाएगा तो आगे जाएगा, तब लगा रफी जैसा कोई बेरागी सा गायक आया है। मगर यह क्या तुम अपने ढंग के एक नए बादशाह रंगीला ।
सुफियाने का मतलब था तुमसे पंजाब के बाबा बुल्लेशाह और बाबा फरीद की पवित्र वाणी को सुनना। हजरत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो को सुनना । कबीर को सुनना। क्या तुम्हें अमर वाणियों को गाने का अधिकार है। अगर इतने रुपए सचमुच लिए तो जानते हो किस जगह आकर करोड रुपए लिए हो। जहां हजारों लोग केदारनाथ की आपदा में डूबे हों। कई घर बर्बाद हुए हों। जहां कई गांव में ताले लग गए हों। क्या इतने रुपए लेने के बाद तुम इस लायक हो कि बुल्लेशाह को गाओ। भूल कर न गाना। उन पवित्र आत्माओं की आह लगेगी तुम पर
3- जानते हों ये वही राज्य है , जिसके एक सैनिक के सिर को घात लगाकर पाकिस्तानी सैनिक काट कर ले गए थे। पैसे के अभाव में आज तक उस शहीद की दस हजार रुपए की एक प्रतिमा नहीं बन पाई। जानते हो इस राज्य में लोक कलाकार केवल दो सौ रुपए पारिश्रमिक पर एक छोर से दूसरे छोर की यात्रा करते हैं। ऊपर से संस्कृति विभाग के अफसर उन्हें अहसान तले दबाते हैं। कई बार अभद्र व्यवहार भी करते हैं। और तुम्हें क्या सचमुच करोड मिल गए। हैरत है। अजब तमाशा है। देश दुनिया तो जाने तुम्हें करोड कैसे मिल गए।
4- जानते हो यहां के लोक गायक- गायिका , कबोतरी देवी, वचनदेही, केशव अनुरागी गोपाल बाबू गोस्वामी, चंद्र सिंह राही नरेंद्र सिंह नेगी, प्रीतम भर्तवाण, रेखा उनियाल, अनुराधा निराला, मीना राणा वसंती देवी संगीता ढौंडियाल सबने तीन चार दशक की संगीत की तपस्या के बाद भी मिलाकर तीन करोड रुपए नहीं कमाए होंगे। क्या सचमुच तुम एक रात में नोटो की बोरियां ले गए।
क्या तुम जान पाओगे कि इस उत्तराखंड की एक युवा कत्थक नृत्यांगना बच्चों को सिखाकर फिर उस पैसे से अपने कार्यक्रम का आयोजन करती है। क्या तुम जान पाओगे कि इस उत्तराखंड में कई रचनाकार अपने वेतन के पैसे से कविता किताब लिखकर प्रकाशित करवाते हैं। जहां के रंगकर्मी पैसे मिलाकर पहाडों के लोकनाट्य का मंचन करते हैं। जहां महीने भर की रामलीला की तालीम के बाद राम लक्ष्मण के अभिनय करने वाले मुश्किल से एक हजार रुपए भी नहीं पाते हैं।
5 – जब तुम नए नए पोपुलर हुए थे। विविध भारती के एक कार्यक्रम में अपनी बहन को लेकर भावनात्मक बातें कर रहे थे। अपनी गरीबी का जिक्र कर रहे थे। पता है कि जिस राज्य से तुमने इतने रुपए एक रात के कार्यक्रम के लिए, वहां घर घर में बहनों के भाई सीमाओं पर लड़ रहे हैं। तुम्हारी और तुम्हारी बहन बहन के रक्षा के लिए । और क्या सचमुच इतने रुपए लेकर तुमने उन्हें कंगाल बनाने की सोची। उस उत्तराखंड में जहां पंद्रह साल में तीस लाख लोग पलायन कर चुके हैं। जहां सड़क स्कूल अस्पताल के लिए पैसा नहीं, वहां तुम्हें क्या वीडियो बनाने गाने के लिए पैसे दिए गए।
6- सुफियाना हमारे लिए एक दर्शन है , उसमें पवित्रता है मानवता है, आत्मा परमात्मा का अनूठा संबंध है। तेरी सूफियानी आत्मा एक रात में करोड रुपए साफ कर गई । । अगर ये सच है तो आज के बाद सब कुछ करना, पर बाबा बुल्लेशाह बाबा फरीद और दूसरे सुफियाने संतों का नाम अपनी जुबान पर मत लाना। उन आत्माओं को दुख होगा। तब तुमने बड़ा सांसारिक कोई नहीं।
7 – कुछ समय पहले किसी ने बताया था कि ओली में भी तुमने एक आयोजन के नाम पर अस्सी हजार रुपए लिए थे। बरफ गिरने से आयोजन नहीं हुआ। केवल चार पत्रकारों को चलताऊ शैली में गाने सुनाकर तुमने वो रुपए ले लिए। तब विश्वास न हुआ। क्योंकि मन में तुम्हारी अलग छवि थी। आखिर माजरा क्या है।
8- गुजरात हिमाचल से इस प्रदेश की तुलना मत करो। गुजरात हमारी तरह अभागा राज्य नहीं। वहां आपदा में दस हजार लोग नहीं मरे, वहां खेत खलियान खत्म नहीं हुए। वहां के लोगों में समृ्द्धि है। वहां पलायन नहीं हुआ। वह समृद्ध राज्य है। उसका आर्थिक विकास उसे सबल बनाता है और गुजराती अमिताभ को धन दे सकते हैं। लेकिन घोर विपत्ति में जी रहा उत्तराखंड तुम पर पैसे नहीं लुटा सकता। अच्छा होता नवरात्रि में महिला हाकी टीम की कप्तान उत्तराखंड की वंदना कटारिया का किसी स्तर पर सम्मान होता। क्या सचमुच तुम्हारे सुफियाने में उत्तराखंड के एक करो़ड रुपए जल गए।
8- अभी भी तुम्हारी अंदर गैरत है तो इन पैसो को वापस कर दो। उत्तराखंड आंदोलन के शहीदों की आत्माएं तुझे माफ कर देंगी। बाबा बुल्लेशाह तुझे माफ कर देंगे। गल्तियां सबसे होती हैं। आगे आ और अपनी भूल को स्वीकार कर। उत्तराखंड के लोग सेना में हर युद्ध में लड़े हैं शहीद हुए हैं। इस भूमि का स्मरण कर और उतने पैसे ले जितनी तेरी क्षमता है। बाकी पैसा लौटा दे। ये पैसा हमारे गरीबों का है, मां -बहनों के पसीने का है। सीमा पर तैनात फौजी का है। औजियों का है, किसानो का है। इस पैसे को लौटा दे। तब फिर सुफियाना गा लेना।
कैलाश खैर, अपने राज्य के लिए यह लिखना मेरा फर्ज है। और इस फर्ज को निभाते हुए मुझे संतोष महसूस होता है। हम न रहें तब जो मन आए कर लेना

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