दो दशक की लम्बी लड़ाई के बाद पत्रकारों को मिला न्याय

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दो दशक की लम्बी लड़ाई के बाद पत्रकारों को मिला न्याय

देहरादून। यह एक दुःखद लेकिन कटु सत्य है, कि भ्रष्टाचार और विलम्ब भारतीय न्याय व्यवस्था का एक स्थायी भाव परन्तु सर्वस्वीकार्य शर्तो के रूप में स्थापित हो चुके हंै। न्याय पाने के लिए सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार और विलम्ब के दुष्चक्र से पार पाना ‘दिये और तूफान‘ की कहानी दोहराने से कम नही है। वास्तव में मामला कोई बड़ा फौजदारी अथवा किसी जमीन जायजाद का सिविल मुकदमा भी नही था, बल्कि यह तो सामान्य 60-65 कर्मचारियों के भविष्य निधि के अधिकार का साधारण सा मामला था। लेकिन जब साधारण सी कानूनी प्रक्रिया पर साहूकार की भृकुटि तनती है, तब भ्रष्टाचार जनित लालफीताशाही के चक्रव्यूह का भेदन किसी अभिमन्यु के बस की बात नही रह जाती।
लगभग दो दशकों की लम्बी इस कानूनी संघर्ष की गाथा वर्ष 1990 में प्रारम्भ हुयी। जब पैट्रोलियम एण्ड एनर्जी पब्लिकेशन प्रा0 लि0 देहरादून द्वारा संचालित हिमाचल टाइम्स नामक समाचारपत्र को कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952 के अधीन आवृत्त किया गया। जिसके अनुसार सभी कर्मचारियों को प्रोविडेंट फण्ड की सुविधा मिलनी थी, लेकिन प्रबन्धन द्वारा केवल गिने चुने कर्मचारियों को ही इसका लाभ दिया। लगभग 65 पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों की इस कानूनी अधिकार से वंचित ही रखा गया। यों तो देश में कर्मचारियों के हित संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा के लिए बने कानूनों को लागू करने के लिए सरकारी अमले में इन्सपेक्टर से लेकर कमिश्नर तक तैनात हैं, लेकिन वास्तविक धरातल पर यह लम्बी चैड़ी फौज सफेद हाथियों का झुंड ही है। उक्त संस्थान के सेवायोजकों द्वारा वर्ष 1990 से 95 तक प्रोविडेंट फण्ड की सुविधा नहीं दी तो प्रेस कर्मचारी संघ सीटू के बैनर तले गिरीश पंत ने कर्मचारियों के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की। बस फिर क्या था सेवायोजकों ने भविष्य निधि का अधिकार देने के बजाए सभी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की छंटनी कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि भविष्य निधि तो दूर सभी कर्मचारी रोजी रोटी के लिए भी संघर्ष करने को मजबूर हो गए। प्रेस कर्मचारी संघ के अध्यक्ष गिरिश पंत ने इस अन्याय की लड़ाई सड़क की बजाय कानूनी सीमा में ही लड़ने का निर्णय लिया। कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952 को धारा 7(।) के अधीन एक वाद वर्ष 1995 को भविष्य निधि आयुक्त कानपुर के सम्मुख प्रस्तुत किया। सामान्यतः ऐसे मामलों का निपटारा लगभग तीन चार माह में ही हो जाना चाहिए था, लेकिन तारीख पर तारीखों का सिलसिला प्रारम्भ हो गया। कानपुर से यह फाइल बिना किसी ठोस कार्यवाही के 8 जनवरी 1997 को देहरादून भेज दी गई। आसमान से गिरे खजूर में अटके। पांच वर्ष तक भविष्य निधि कार्यालय देहरादून में सुनवाई चलती रही। मामले को अधिक से अधिक लंबा खीचनें की काबिलियत भी एक वकील की सफलता और उसकी फीस का मापदण्ड है। ऐसे मामलों में वकीलो के भेष में दलाल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सेवायोजकों ने यही समय सिद्ध फार्मूला अपनाया और वे सफल भी रहे। एक सुनहरी सवेरे पंत को पता चला कि क्षेत्रीय भविष्य आयुक्त एम.के. पान्डे ने 65 कर्मचारियों का 6 साल का प्रोविडेंट फंड जो लाखों रूपया बनता था उसे खारिज करते हुए मात्र कुछ हजार में समेट कर 22 दिसम्बर 2002 को आदेश पारित कर दिये। यह दीगर है कि कुछ समय पश्चात एम.के. पांडे को सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था और उनके पास आय से अधिक बेनामी सम्पत्ति के मामले भी उजागर हुए थे। खैर कर्मचारियों को इस मामलें में पुर्नविचार हेतु दिल्ली तक दौड़ लगानी पड़ी। मामला मुख्य आयुक्त नई दिल्ली के हस्तक्षेप से फिर खुल तो गया लेकिन सेवायोजकांे और उनके वकीलांे ने मामले को 2004 तक लटकाने में सफलता पाई। इस बीच कई अधिकारी आए और गय लेकिन फाइल के पन्नों में तारीखों के अलावा कुछ भी नही लिखा जा सका। कर्मचारियों के भाग्य की बात है कि वर्ष 2004 मे सहायक भविष्य निधि आयुक्त जे.ए. वर्मा नियुक्त होकर आए। इस कर्मठ अघिकारी ने मामले की जांच कर 15 अक्टूबर 2004 को विधिवत् निर्णय सुनाते हुए सेवायोजकों को कर्मचारियों के भविष्य निधि जमा करने के आदेश दिए। कर्मचारियों को आशा बंधी कि अब उन्हें भविष्य निधि की राशि मिल जाएगी लेकिन अभी संघर्ष बाकी था। मालिको ने जे.ए. वर्मा के आदेश के विरूद्व हाईकोर्ट नैनीताल के समक्ष चुनौती दी। यह रिट याचिका पूरे चार वर्ष हाईकोर्ट मे पड़़ी रही आखिरकार 30जुलाई 2008 को हाईकोर्ट ने पत्रावली पुनः विचार हेतु प्रोविडन्ट आॅफिस को वापस भेजते हुए मामले में तीन माह के अन्दर रिपोर्ट देने के आदेश पारित किए। अब 12 वर्ष पहले जो कहानी शुरू हुई थी वहीं पर आकर खड़ी हो गई। आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान कर्मचारियों के न्याय की आस छोड़ दी। हताशा और निराशा का बल पाकर दुर्देव ने 3 कर्मचारियों का जीवन लील लिया। लेकिन गिरीश पंत ने हिम्मत नही हारी और कर्मचारियों के हक की खातिर लड़ाई को जारी रखा। आखिर 20 सितम्बर 2011 को तत्कालीन भविष्य निधि आयुक्त राकेश सहरावत व सहायक आयुक्त योगेश कुमार ने मामले में साक्ष्यों और अभिलेखो के आधार पर सेवायोजकों को वर्ष 1990 से 1996 तक का भविष्य निधि का देय मय ब्याज समेत भुगतान करने का आदेश पारित किया।
हैरत की बात थी कि वाद के निस्तारण के दो वर्ष के बाद भी भविष्य निधि संगठन के अपने ही आदेश को पालन करने के लिए कोई कार्यवाही नही की। जबकि कानूनी वैद्यता है कि कर्मचारियों का प्रोविडेंट का पैसा यदि मालिकांे द्वारा समय से जमा नही किया जाता तो बकाये की वसूली कलेक्टर के माध्यम से तंुरत की जानी चाहिए। हमारे देश में पुस्तकों में लिखे कानून केवल समर्थ लोगों की जेब में रहते हैं और जरूरत के समय कमजोर वर्ग के काम नही आते है। फाइलंे इन्सपेक्टरों के बस्तों में कैद ही रह जाती हैं। भाग्यवश देहरादून में क्षेत्रीय आयुक्त के रूप में राजीव बिष्ट की तैनाती नही होती तो शायद कर्मचारियों का मामला पहले की तरह अधर में ही लटका रहता। इस कर्मठ अधिकारी ने वर्षों से न्याय की आस संजोये कर्मचारियों और मृतक आश्रितों की कठिनाई को समझकर मालिकों पर बकाया भुगतान करने का दबाब बनाया और अंततोगत्वा 65 कर्मचारियों को बकाया फंड का पैसा मिलना शुरू हो गया। यद्यपि हाई कोर्ट नैनीताल ने स्पष्ट रूप से मामले को तीन माह में निपटाने के आदेश दिये थे। दो दशक तक चली लम्बी व खर्चीली कानूनी लड़ाई में निरंतर संघर्ष करते हुए पंत ने यह साबित कर दिया कि भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नही। कर्मचारियों की दो दशक तक चली लम्बी कानूनी लड़ाई यह सोचने को मजबूर करती है, कि जब जागरूक कर्मचारी वर्ग को अपने कानूनी अधिकारों को पाने के लिए इस प्रकार सालो- साल संघर्ष करने को बाध्य होना पड़ता है तो आम और सामान्य कर्मचारी की दशा क्या होती होगी। वास्तव में यदि हम कानूनों की व्यवस्थाओं का लाभ जरूरत वालों तक पहंुचाना चाहते हंै तो हमें सभी क्लासी जूडीशियल प्राधिकारियों के मामलों के निपटाने की एक निश्चित समय सीमा तय करनी होगी । अन्यथा न्याय में विलम्ब न्याय के विरोध की ऐसी कहानियां हमेशा ही दोहराई जाती रहेंगी।
एस.पी. कुकरेती पूर्व उपश्रमायुक्त

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