जिन पत्रकारों के पनारे बहती थी सत्ता, आज किनारा छूकर भी नहीं गुजरती

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जिन पत्रकारों के पनारे बहती थी सत्ता
आज किनारा छूकर भी नहीं गुजरती:Jouranalist Uttarakhand BJP GOVERMENT HOLD

कभी गफलत में रहकर सुर्खियों में आया, कभी कंधे पर चढ़कर, पब्लिसिटी को मुझे छूकर गुजरना पड़ा था। एक समय में, उस ऊंचाई का आलम यह है कि आज अपनों से भी मुरब्बत नहीं होती मुझे.
२००२ में नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल से जो हस्तकलाये कुकुरमुत्ते की तरह अनायास उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी में पनप गयी है। वो आजकल बौराये – बौराये घूम रहे है. आप भी इस बार समझ रहे होंगे कि इस बार नारायण परगाई कोई पहेली लिखेगा पर आज ऐसा नहीं होगा.


आज भड़ास खुलकर ऐसे कलाकार पिस्सुओं के बारे में लिखेगा जो सत्ता के गलियारे में बैठ कर एक वक़्त किसी भी मुद्दे और रसूख को अपने पनारे से बहाया करते थे.
पत्रकारिता और पत्रकार आज सिर्फ लोगो की नजरो में उस पानी की तरह हो गयी है जो पियो तो लीटर में और बहो तो मिलीमीटर में और बरसो तो सेंटीमीटर में, पर हमेशा से ऐसा नहीं था। आज पत्रकारिता सिर्फ अधिकारियो और नेताओ के बीच वेश्या के कोठे पर बैठे बिचौलिए की तरह हो गयी है बस अपना उल्लू सीधा करो और अपनी जेबे गर्म कर दड़म हो जाओ.
एक समय ऐसा था कि पत्रकारों से मिलकर लोगो को टोकरा भर ख़ुशी होती थी। और आज लोग पत्रकारों को देखकर कन्नी काट लेते है कि कही ये हमारा खुशियों का टोकरा ना खाली कर दे.

उत्तराखंड राज्य में पत्रकारों के पनारो से बहने वाला पानी आजकल बीजेपी के राज में सूख गया है इसलिए आजकल उत्तराखंड में लोग सीएम त्रिवेंद्र रावत को हटाने की साजिश को अंजाम देने में लगे है.
कलम खुन्नूश आजकल अपने दड्बो से बाहर निकल एजेंडा पत्रकारिता कर रहे है जो पत्रकारिता के लिहाज़ से बिलकुल भी ठीक नहीं है. ऐसे लोगो के वजूद ने पत्रकारिता को हमेशा से शर्मशार किया है. भड़ास आज भी ऐसे लोमङो का असल चेहरा उजागर करने में पीछे नहीं हटेगा.

उत्तराखण्ड में पूर्व कांग्रेस कि सरकार में कई पत्रकारों कि पेशाब से दिए जला करते थे। लेकिन बीजेपी सरकार के मुखिया त्रिवेंद्र सिंह रावत कि सत्ता में आने के बाद उनके दिए बुझ गए है सचिवालय के अनुभाग से लेकर कई अफसरों के दरबार में उनकी इंट्री पूरी तरह पाबंद हो चुकी है। जिसको लेकर यही कहा जा रहा है कि अपनी पेशाब से पूर्व कि सरकार में दिए जलाये जाने का करतब दिखा चुके ऐसे मीडिया वालो को कोई भी अब अपने पास फटकता हुआ नज़र नहीं आता।

बीजेपी सरकार के खिलाफ एजेंडा पत्रकारिता का बिगुल बजा कर भी सरकार के कानो तक कोई हरकत नहीं हो रही जिसको लेकर भी सत्ता के गलियारों में इनके राजनैतिक आका परेशानी में नज़र आ रहे है.
१३ जुलाई को भड़ास ने एक लेख प्रकाशित किया था जिसमे चुतील…भरे नाम का किरदार था. भड़ास कल उस चुतील…भरे के असल नाम और कारनामो को चवनप्राश खिला खिला कर प्रकाशित करेगा. एक आपातकालीन डॉक्टर को भी भड़ास ने उनके घर पर तैनात करने का मन बनाया है। क्यूकि भड़ास की खबर के बाद उसको डेंगू का बुखार और हृदयघात आने की संभावना है.

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