विधान सभा के समक्ष नही रखा गया सूचना आयोग का 4 साल का लेखा जोखा

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विधान सभा के समक्ष नही रखा गया सूचना आयोग का 4 साल का लेखा जोखा

देहरादून जबाबदेही तथा पारदर्शिता का पाठ अधिकारियों को पढ़ाने वाला उत्तराखण्ड सूचना आयोग ही खुद जबाबदेही तथा पारदर्शिता से बच रहा है। खुद उत्तराखण्ड सूचना आयोग ने पिछले वर्ष 2014-15 का प्रतिवेदन अभी तक तैयार ही नहीं किया है तथा उससे पहले तीन वर्षो के प्रतिवेदन देरी से अप्रैल 2015 में एक साथ केवल 2 प्रतियों में दिया है। विधानसभा में रखनें हेतु 180 प्रतियां उपलब्ध ही नहीं करायी गयी है।
उक्त खुलासा काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन को उत्तराखंड सूचना आयोग, विधानसभा उत्तराखंड तथा उत्तराखंड सरकार के सूचना अधिकार के नोडल विभाग सामान्य प्रशासन विभाग के लोक सूचना अधिकारियों द्वारा उपलब्ध करायी गयी सूचना से हुआ है।
विधानसभा उत्तराखंड के लोक सूचना अधिकारी वरिष्ठ शोध एंव संदर्भ अधिकारी मुकेश सिंघल द्वारा उपलब्ध करायी गयी सूचना के अनुसार उत्तराखंड सूचना आयोग के वर्ष 2010-11 तक के वर्षिक प्रतिवेदन ही विधानसभा के समक्ष रखे गये है। वर्ष 2005-06 का प्रतिवेदन 27 नवम्बर 2007 को वर्ष 2006-07 का 17 दिसम्बर 2008 को वर्ष 2007-08 का 23 सितम्बर 2010 को तथा वर्ष 2008-09 का 05 जून 2012 को, वर्ष 2009-10 तथा 2010-11 के वर्षिक प्रतिवेदन एक साथ 20 जनवरी 2014 को विधानसभा के समक्ष रखे गये है।
सामान्य प्रशासन विभाग के लोक सूचना अधिकारी /उपसचिव गिरघर सिंह भाकुनी द्वारा श्री नदीम को सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 25 के अन्तर्गत उत्तराखंड सूचना आयेाग द्वारा दिये गये अपने वर्षिक प्रतिवेदन के सम्बन्ध में उपलब्ध करायी गयी सूचना में स्पष्ट है कि वर्ष 2009-10 तथा वर्ष 2010-11 की वार्षिक रिपोर्टो को विधानसभा के समक्ष रखने के लिये आवश्यक 150-150 प्रतियां 6 जनवरी 2014 को विधानसभा के सचिव को प्रेषित पत्र से सूचना आयोग द्वारा उपलब्ध करायी गयी है। वर्ष 2011-12, 2012-13 तथा 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट केवल दो प्रतियों में सूचना आयोग के सचिव ने अपने पत्रांक 4384 दिनांक 24 अप्रैल 2015 से सचिव सामान्य प्रशासन को उपलब्ध करायी है। इस पत्र में प्रत्येक प्रतिवेदन की शेष 180 प्रतियां पृथक सेें उपलब्ध कराने को लिखा गया है लेकिन इन्हे अभी तक उपलब्ध कराने का कोई विवरण नही है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा श्री नदीम को यह भी सूचित किया गया है कि वर्ष 2014-15 के प्रतिवेदन की प्रति राज्य सरकार को प्राप्त नहीं हुई है।
उत्तराखण्ड सूचना आयोग के लोक सूचना अधिकारी /सहायक लेखाधिकारी मनमोहन नैथानी ने श्री नदीम को सूचित किया है कि वर्ष 2014-15 की वार्षिक रिपोर्ट प्रक्रियाधीन है।
श्री नदीम ने बताया कि सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत वर्ष के अन्त में प्रदेश में सूचना अधिकार का समस्त लेखा जोखा, सुधार हेतु अपनी सिफारिशों सहित अपनी रिपोर्ट में शामिल करके सरकार को देना आवश्यक है जिसे यथाशीघ्र विधानसभा के समक्ष रखना सरकार का दायित्व है लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। उत्तराखंड सूचना आयोग द्वारा अपने इस कर्तव्य से उदासीनता दिखाना उत्तराखंड में सूचना अधिकार के विकास तथा जबाबदेही व पारर्शिता के प्रतिकूल है। उल्लेखनीय है कि सरकार को विधानसभा के समक्ष इन प्रतिवेदनों को इन पर कार्यवाही की आख्या के साथ प्रस्तुत करना होता है। सूचना आयोग द्वारा ही अपना वाषिर्क प्रतिवेदन समय मे न देने तथा विधान सभा में रखने हेतु प्रतियां न उपलब्ध कराने से सरकार तो सूचना अधिकार के संबंध में कार्यवाही करने व उसकी जबाबदेही से स्वतः ही बच गयी है।

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