ईटीवी प्रखर मिश्रा की हिमालय दिवस पर ‘निशक’ चरण वंदना

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ईटीवी प्रखर मिश्रा की हिमालय दिवस पर ‘निशक’  चरण वंदना HIMALAYA DIWAS ETV MP HARIDWAR CHARAN VANDANA ईटीवी प्रखर मिश्रा की हिमालय दिवस पर 'निशक' चरण वंदना देहरादून हिमालय दिवस कर न्यूज़ चैनल द्वारा हरिद्वार के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को हिमालय पुत्र दिखाये जाने को लेकर सोशल मीडिया पर चैनल के नए बनाये गए प्रखर मिश्रा निशाने पर आ गए है प्रखर मिश्रा उत्तराखंड की मीडिया में हरीश रावत सरकार के समय देहरादून में आए थे यहाँ पर उनके द्वारा नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल को अपनी तेज़ आवाज़ के कारन एक अलग पहचान मीडिया से लेकर राजनैतिक लोगो के कानो तक पंहुचा कर दी थी वर्तमान समय में वो ईटीवी देहरादून में समाचार सम्पादक के रूप में अपनी सेवा दे रहे है

लेकिन उन की एक खबर ने बता दिया है की किस तरह उनके मन में हिमालय के प्रति अपनी भावना है जो उनकी पत्रकारिता के मापदंडो पर सटीक सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है उत्तराखंड में हिमालय के लिए हेमवती नंदन बहुगुणा द्वारा किया गया काम आज भी हिमालय की तरह अटल कहा जा सकता है यही वजह थी की उनको हिमालय का चन्दन और नंदन कहा जाता था सोशल मीडिया पर अखिलेश डिमरी ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है और उनके आलावा सोशल मीडिया पर लगातार निशंक को हिमालय पुत्र के नाम से कहे जाने को लेकर विरोध से लेकर प्रखर मिश्रा की पत्रकारिता को किस तरह तमाचा मारा जा रहा है यही नहीं कई दूसरे लोगो ने इसको चरण वंदना का नाम दिया है

Akhilesh Dimri
हिमालय दिवस
आ गया है मौका विद्वान बनने का , देश और प्रदेश के साथ साथ हिमालय के हालातो पर चिंता जताने का , जल जंगल ज़मीन की बाते करने का, भाषणों से ओज प्रवाहित ते हुए आखिर में खुद को सबसे समझदार और प्रदेश की चिंता करने वाला सुधि व्यक्तित्व स्थापित करने का यही मौका है बखूबी इस्तेमाल कीजिये ।
इन दिनों सुना हिमालय दिवस है, और वह आवरण जिसको समेट हमने हिमालय पर अपनी विद्वता की परत चिपकानी है वो हमसे बेहतर कौन जान समझ सकता है …? याद है न कलम के सिपाही झबरेडा पर भी उतना ही बोले थे जितना सीमेंट की फेक्ट्री पर , वो श्रीनगर पर भी उतने ही उत्साहित थे जितना पीपल कोटी विश्नुगाड पर …! मलेथा के बाद नानीसार और अब फिर से चाय बागान के बाद पंचेश्वर का मौका है जहां ये हिमालय के नाम पर लपेटा आवरण चिपकाना है ……!
पहले वाले कह चले हम सुन चले अब वो तिम्ले की चटनी बना रहे है , ये आये हैं इन्होंने शपथ दिला दी अब आखिर में रवायतों को निभाने का दौर है, जल्दी कीजिये फिर मौका एक साल बाद हाथ लगेगा , इसलिए इस्तेमाल तो होना ही चाहिए ।
कुछ ख़ास लोग आज भी रेड्डी होंगे वो धारी देवी तो हमने झूठी कसमे खाने हेतु इस्तेमाल के लिए पहले ही सुरक्षित रख दी थी, खैर जो मसीहा थे उनके मकानो के साइज बदल गये है सीमेंट के आगे कोटा स्टोन की कोटिंग , फर्शे संगेमरमर , शाहदाब पे लटक्ते झूमर, चटर पटर अँग्रेज़ी बोलते बच्चे और डर्टी पीपल के साथ नही खेलते बेटा बोलती हुई मॉम…….अँग्रेज़ी दा बच्चे, फेश्नेबल मॉम और पहाड की चिंता जताता हुआ खान्टी पहाड़ी पिता कितना गजब संयोग है …………….!
बच्चे घर गाँव को पहाड़ कहते है , वहां जाना नही चाहते या मॉम ले जाना ही नही चाहती, ले जाएँगी तो बच्चे पर ग़लत असर पड़ेगा , गाँवों के रिश्ते उनके लिए पिज़्ज़ा बर्गर की तरह हुए पड़े है जो क्रेडिट कार्ड की तरह उधारी है ……..ये सब क्यो ……? क्योकी पिता चिंता करता है पहाड की …! पर्यावरण की…! हिमालय की ….! साल मे एक बार ही सही पर चिंता करता है ।
खैर जाने दीजिए आप अपने पूर्व वत कार्यक्रमो मे मेरी इस पोस्ट की वजह से खलल मत डालिएगा उन्हे वैसे ही चलने दे, निर्बाध लूट्ती ज़मीनो ,नदियो, पहाडो की तरह , क्योंकि ये लुटेंगे तो किसी के मकान बनेंगे देहरादून मे , किसी का मेहरोली / दिल्ली मे फार्म हाउस बनेगा, कोई अगले वरस देहरादून के अच्छे होटल का सौदा करेगा , सरकारें गिरेंगी बनेंगी , कभी पलायन रोकेंगे के नाम पर तो आगे हिमालय के नाम पर।
खैर …..! पापा की चिंता बहुत ज़रूरी है, चिंता ग्रस्त दिखता खाण्टी पहाड़ी पिता बच्चो के लिए पिज़्ज़ा बर्गर और सामाजिक भाषाई भिन्नता स्थापित करने मे सहायक सिद्ध होता है , इसलिए ये हो रही चिंताए बिलकुल जायज़ है , करते रहिए चिंताएं कम से कम आज के दिन तो हक बनता है आपका ।
देखिए तो कही तंबू लग गया होगा जॅहा चिंता करनी है आपको जाइए दौड़ कर अपनी चिंता जाहिर कर दीजिए, वरना कुछ लोगो ने हर मौके पर चिंता जाहिर करने का ठेका लिया हुआ है , वे पहले से ही कब्जा किए होंगे अबके उन्हे उठाइए खुद वहा बैठ जाइए, वरना समझौता करिए उनसे की चिंता करने का इतना हिस्सा तुम्हारा और उसके बाद हमारा ,मिल बाँट कर चिंता करिए पर करिए ज़रूर ।
सनद रहे ! जितनी देर तुम चिंता करोगे उतनी देर में वो बूढ़ी माँ , छोटी बहन , बड़ी भाभी और पड़ोस की ताई भरी दुपहरी उन रास्तों पर मीलों पैदल चल घास लकड़ी पानी लेकर तुम्हारे लिए चाय , नाश्ते और भोजन की व्यवस्था कर चुके होंगे जिन पर घास लकड़ी पानी और सड़क के लिए पर्यावरण लगा हुआ है और ये पर्यावरण हिमालय के लिए हम पर लगे इतना तो बनता है।
बाकी मीडिया की मनोदशा और उसके हवाले से हिमालय का नया नामकरण हो गया है , बाकायदा घोषित नामकरण कुछ लोग चाहे तो उस हिमालय के बहाने इस हिमालय का भी पूजन कर सकते हैं, सबके अपने अपने हिमालय है अपनी अपनी सुविधा के अनुसार , वो जिस हिमालय को केंद्रित किया जा रहा है उसकी छाती पर तो पंचेश्वर बाँध बनेगा , उसे रहने दो उसके हाल पर ….! क्या फायदा उसकी बात करके ….? आज बात हुई तो नया हिमालय आ गया कल बात होगी तो कोई पंचाचुली भी आ जाएगा। वैसे भी इस सूबे के माँ बाप की घोषणा तो हो ही चुकी है।
वंदेमातरम्।। जय गौमाता।।

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