आदतें बदली जा सकती हैं : Habbits will be change with straight efforts & hopefull thoughts

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आदतें बदली जा सकती हैं : Habbits will be change with straight efforts & hopefull thoughts

हमारी आदतें बदली जा सकती हैं। इसलिए यह मान्यता गलत है कि आदतें नहीं बदली जा सकती हैं। आज हम यह कह कर अपनी आदत नहीं बदल पाते हैं कि अब हमें इस बात की आदत पढ़ गयी है। जब तक हम एक बार प्रयास नहीं करते तब तक हमें यह नहीं पता चलेगा कि आदतें बदली जा सकती अथवा नहीं बदली जा सकती हैं। लेकिन एक बार थोड़ी सफलता के बाद हमारी यह मान्यता बदल जाती है कि आदतें नहीं बदली जा सकती हैं।  प्रयास करने से हमारी आदतें ही नहीं कड़क से कड़क संस्कार भी बदले जा सकते हैं। एक बार अनुभव कर लेने पर हमारी मान्यता बन जाती है कि आदतें बदली जा सकती हैं। इसलिए जीवन में बिना किसी अनुभव के किसी चीज को न तो एक्सेप्ट करना चाहिए और न ही रिजेक्ट करना चाहिए।
इसलिए आज से नये दिन की शुरूआत करें हम स्वयं के प्रति नजरिये में बदलाव करें। पुरानी मान्यता छोड़ दें। स्वयं पर संदेह करना छोड़ दें। पुरानी शिकयत छोड़कर नये जीवन की शुरूआत करें।
हमारी आदत नहीं बदल सकती है। हर बार यह कहने की आदत भी हमें बदलनी पड़ेगी।
जितनी बार हम कहते हैं कि हम यह कार्य नही कर सकते हैं हम निरन्तर अपने को कमजोर करते जाते हैं। यह कहने से हमारे अन्दर विश्वास भर जाता है कि हमसे यह कार्य नहीं हो सकता है। इस विश्वास के आधार पर हम कहने लगते हैं कि मेरी एक ही कमजोरी है। जितनी बार हम अपनी कमजोरी को स्वीकार करेंगे वह कमजोरी हम पर हावी हो जायेगी।
हम बड़े आसानी से कह देते हैं कि इसके बिना हमारा काम नही चल सकता। हम छोटी-छोटी बात पर कहने लगते हैं कि इसके न होने पर हम डिस्टर्ब हो जाते हैं। हम कहते है कि चाय के बिना मेरा काम शुरू नहीं हो सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि सो कर उठते ही मुझे कुछ चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि सोने से पहले मुझे कुछ चाहिए।
यदि छोटी-छोटी बात पर हम यह कहेंगे कि हम यह काम नहीं कर सकते हैं, तब यह काम नहीं कर सकते हैं, तब हम कोई बड़ा काम नही कर सकते हैं। जो व्यक्ति दस मीटर नहीं दौड़ सकता है वह सौ मीटर कैसे दौडे़गा। जीवन में जब हम छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देंगे तब बड़ी-बड़ी बातें नहीं आयेंगी।
चाय पीना मुझे अच्छा लगता है। लेकिन यह कहना उचित नहीं है कि चाय के बिना मेरा काम नहीं चल सकता है। कम्फर्ट जोन और एडिक्शन में अन्तर है। यह करना मुझे अच्छा लगता है यह कम्फर्ट जोन है। इसके बिना मेरा काम नहीं चल सकता है यह एडिक्शन है। लेकिन कम्फर्ट जोन कब एडिक्शन में बदल जाये यह हमें पता नहीं चलता है।
जब हम कहते हैं कि इसके बिना हमारा काम नही चल सकता है। इसका अर्थ है कि हम उस चीज के गुलाम हैं। जब हम एक चीज के गुलाम होते हैं तो अन्य चीजों के गुलामी सम्भावना बढ़ जाती है। गुलामी मानसिकता हमारी शक्ति को घटाती है। इसके विपरित यदि हम एक चीज पर विजय प्राप्त कर लेते हैं तो विजय प्राप्त करना आसान होता है। हर चीज विधि से करनी चाहिए। विधि नहीं तो सिद्धी नहीं ।
हमारी हैबिट हमारे भाग्य का निर्माण करती है। हमारी हैबिट हमारे एटिट्यूड से बनता है। हमारा एटिट्यूड हमारे थाॅट से बनता है। हमारी पर्सनाल्टी हमारी हैबिट से बनती है। जो हमारी पर्सनाल्टी होगी वहीं हमारी डेस्टिनी अथवा भाग्य होगी। अर्थात हैबिट बदलने के लिए थाॅट और एटिट्यूड को बदलना जरूरी है।
मनोज कुमार श्रीवास्तव
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