गुरूद्वारे में होता है ग्रंथो का अंतिम संस्कार

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गुरूद्वारे में होता है ग्रंथो का अंतिम संस्कार

देहरादून अपने ही भारत में आखिर ऐसा क्यों देश भर में फट चुके व पुराने हो चुके धार्मिक ग्रंथो को लेकर भारत में सिर्फ देहरादून धार्मिक ग्रंथो को अंतिम संस्कार कर अपने भक्ति को बरक़रार रखते है भड़ास फॉर इंडिया को मिली जानकारी के अनुसार यहाँ इस परम्परा को काफी समय से अंजाम दिया जाता हैधार्मिक ग्रंथ के बहुत पुराने हो जाने, पेज फटने पर इनका क्या किया जाए, इसका उत्तर देहरादून के खुशहालपुर स्थित अंगीठा साहेब गुरुद्वारा में मिलता है।

इस तरह निभाई जा रही है परंपरा …
यहां के गुरुद्वारा में इंसान की तरह ही धार्मिक ग्रंथों का भी अंतिम संस्कार होता है। यहां गुरु के उस वचन को पूरा किया जाता है, जिसमें उन्होंने धार्मिक ग्रंथों व पुस्तकों को बदहाली से बचाने की बात कही थी।
गुरुद्वारे के सेवक हर साल दुनिया घूम कर सभी धर्मो के फटे-पुराने ग्रंथों को एकत्र करके अंगीठा साहेब लाते हैं। गुरुद्वारे में इन ग्रंथों को मखमली कपड़े से साफ कर सफेद चादर में लपेटकर रखा जाता है और अग्नि भेंट सेवा का आयोजन होता है। गुरुद्वारे के एक हाल में 24 अंगीठे बनाए गए हैं।
गुरु सेवक विधि-विधान के साथ एक-एक ग्रंथ को अपने सिर पर रखकर गुरुद्वारे से हाल तक पहुंचाते हैं। एक बार में सिर्फ छह अंगीठों को ही लकडि़यों से सजाते हैं। प्रत्येक अंगीठे के ऊपर 13-13 ग्रंथ, 13 चादरों और 13 रूमालों के बीच रखे जाते हैं। पंच प्यारे हर अंगीठे की 5-5 परिक्रमा करने के बाद अरदास के साथ अग्नि प्रज्वलित करते हैं।
दूसरे दिन कच्ची लस्सी का छींटा मारकर प्रत्येक अंगीठे से फूल (ग्रंथों की राख) चुने जाते हैं। सेवा का अंतिम चरण हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब में पूरा होता है। पंच प्यारों द्वारा अंगीठों से चुने गए फूलों को विधि-विधान से पांवटा साहिब स्थित गुरुद्वारे के पीछे यमुना नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। अपनी तरह का ये पहला भारत में अब तक का जानकारी में आया गुरुद्वारे के रूप में देहरादून का ये गुरुद्वारा बन गया है जहा इस तरह का अंतिम संस्कार किया जाता है

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