गुमनामी में भी लिख रहे दर्द भरे अफ़साने

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गुमनामी में भी लिख रहे दर्द भरे अफ़साने

देहरादून कलम का धनी हर कोई होता है कोई जगह प् जाता है और कोई जनम भर गुमनामी के अंधेरे में घर कर जाता है उत्तराखंड में कई ऎसे कलम वीर से लेकर अपनी कविताओं से ऐसी छाप छोड़ देते है लेकिन सरकार की अगर उन पर नज़र पद जाये तो वो अपनी कलम से कई तरह की क्रांति लिख सकते है भड़ास फॉर इंडिया उत्तराखंड से लेकर देश भर के अंदर छुपी हुई कलाकारों को ऊपर लाने की कोशिश कर रहा है देहरादून में जहा बबिता तनवर और काशीपुर की अंशिका जैन भी अपनी कविता पाठ को लेकर आगे बढ़ रही है देहरादून की बबिता की कविता जहा दिल को छूटी है वही समाज को भी एक नयी मिशाल की तरफ भी कायम करती है

आँखों में आँसु और सपने टूटे लिए बैठी थी
आज तुझे जिन्दगी से बेदखल कर किसी पराये को दिल में जगह दी थी
तेरी होके तेरी न हो पायी ये मैने खुद ही खुद को समझानी थी

मेंरा दिल तो तेरे पास है पर अब बात घर की इज्जत पर आयी है
ख्वाबों के उस चाँद को देख के रोई जिसमें हमनें अपनी दुनियाँ बसाई थी
पर सब कुछ भूलना पड़ेगा मुझे क्योकि अब बात भाई के सीने की आई थी

मेहंदी उसके नाम की रचाई पर मेंहदी में न गहरी लाली थी
छुप-छुप के हथेली में उन लाली के बीच मैंने तेरी तस्वीर सजाई थी
तेरी होके तेरी न हो पायी आखिर बात चाचा ताऊ की इज्जत पर उतर आयी थी

हल्दी का रगं फीका था तेरा नाम लिया रगं महक दोनों खिल आयी थी
हल्दी की साड़ी में लिपटी थी बेजान फिर तेरा नाम लेके जान मुझमें आयी थी
पर क्या करती अपनी ही इच्छा दबा डाली जब बात बाबा की मूछों पर आयी थी

बरात थी मेरे द्धारे पर एक ख्वाब भागने का आया था
अन्जान के साथ कैसे रहूगी मै हमेंषा पर उस वक्त याद माँ के आसुओं की आयी थी
तेरी होके तेरी न हो सकी करती भी क्या अब बात फिर बाबा की मूछों की आयी थी

फेरों के वक्त तेरी एक तस्वीर मन में छपायी थी
सात फेरे तो तेरे सगं लिए उसके सग ंतो रस्में निभायी थी
तेरी होके तेरी न हो सकी बात बाबा की मूछों व माँ की ममताँ पर आयी थी

बाबा ने कन्या दान करा भाई के साथ तब पूरा परिवार ने आँख भिगोई थी
मैं भी रोई खूब जब पण्डित ने उस पराये के लिए मुझे घर का पराया धन बताया था
पर कहती भी क्या उसे आज जब तो मैं अपने घर से ही पराई थी

उठी जब डोली बाबा के घर से मेरी सबने आँखे भर आयी थी
सोचा था डोली से छुप के देखूँगी तुझे तेरी छत पर
पर न उठा पाई घूघँट क्योंकि अब तेरे लिए मैं पराई थी

मैं कुछ न कर सकी अपने प्यार के लिए पर करती भी क्या जब बात बाबा की टोपी पर आयी थी
लेखिका-बबीता तनवार

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