गैरसैण पर गैर हुई सरकार,सोशल मीडिया पर हुई बेनकाब

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गैरसैण पर गैर हुई सरकार,सोशल मीडिया पर हुई बेनकाब :Gairsain CAPITAL UTTARAKHAND BJP GOVERMENT NOT PICK 

गैरसैण पर गैर हुई सरकार,सोशल मीडिया पर हुई बेनकाब

देहरादून गैरसैण में विधानसभा सत्र को लेकर करोड़ो रूपए फुके जाने के बाद भी सरकार गैरसैण को ग्रीषम कालीन राजधानी बनाये जाने का प्रस्ताव लाना तो दूर इस मुद्दे पर दूर जाती हुई नज़र आयी जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट मीडिया में जल्द राजधानी राज्य की जनता को मिलने का बखान करते नज़र आये यही नहीं विधानसभा अध्यक्ष प्रेम चंद अग्रवाल और शिक्षा मंत्री अरविन्द पांडेय तक ने इस बार राजधानी के मुद्दे को लेकर अपनी बात भी खुल कर रखी जिसका भान तक राज्य सरकार नहीं ले पायी विधानसभा चुनावो में 100 दिन के अंदर राजधानी का फैसला किये जाने का वादा किया गया था लेकिन ये वादा पूर्व की सरकार की तरह राज्य की जनता के लिए एक सपना बनकर रह गया है
गैरसैण विधानसभा सत्र को लेकर सरकार का ये फैसला भी गलत करार दिया जा रहा है जिसमे सत्र को लेकर सिर्फ राजनैतिक तमाशा बनाये जाने के लिए वहाँ करोड़ो रूपए फूंक दिए गए लेकिन गैरसैण में राजधानी के मामले को लेकर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया जा सका सरकार की इस इच्छा शक्ति के पीछे का सच जो भी हो लेकिन गैरसैण में विधानसभा सत्र को लेकर राजधानी का मामला सरकार के लिए एक अग्नि परीक्षा का मुद्दा बन गया है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा भाजपा सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा साफ तोर से देखा जा सकता है
इंद्रेश मैखुरी से लेकर कई लोगो ने सरकार को लेकर राजधानी के मुद्दे पर जमकर कोसा है

या भी लड़ै लगीं राली………
गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाए जाने तथा विधानसभा सत्र के नाम पर होने वाले सैर-सपाटे को बंद किये जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करते हुए आज हम फिर जंगलचट्टी में गिरफ्तार कर लिए गए.
हम फिर दोहराना चाहते हैं कि जो राज्य 40 हजार करोड़ रूपये के कर्जे में हो,जिस राज्य में स्थायी रोजगार के बजाय ठेके का रोजगार इस तर्क के साथ दिया जा रहा हो कि स्थायी कर्मचारियों को वेतन देने लायक माली हालत राज्य सरकार की नहीं है,जहाँ सरकार, शराब वालों के पक्ष में इस तर्क के साथ खड़ी हो जाती हो कि शाराब नहीं बिकेगी तो राज्य कैसे चलेगा,वह राज्य न तो मंत्रियों-विधायकों और अफसरों की यह सालाना पिकनिक झेल सकता है,ना ही दो राजधानियां.जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना ही होगा.
सत्ता की पिकनिक का मजा हमारे नारे किरकिरा न कर दें,इसलिए हम गिरफ्तार करके मालसी के सरकार अस्पताल पहुंचा दिए गये.इस अस्पताल की बिल्डिंग बेहद सुंदर है पर अस्पताल चलाने लायक डाक्टर-कम्पाउण्डर-नर्स आदि-आदि जैसा यहाँ कुछ नहीं पाया जाता.यह भवन भी साल में तभी गुलजार होता है,जब सालाना सरकारी पिकनिक के मौके पर पुलिस कर्मियों को यहाँ ठहराया जाता है या हम जैसे आन्दोलनकारी गिरफ्तार करके यहाँ लाये जाते हैं.वैसे पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की दशा का प्रतिनिधि केंद्र भी मालसी का यह अस्पताल हो सकता है.
इस अस्थायी जेल से रिहा हो कर हम अपने ठिकानों तक पहुँच भी नहीं पाए थे कि पता चला कि 7-13 दिसम्बर तक चलने की,जिस सत्र की घोषणा हुई थी,उसे तो दूसरे ही दिन निपटा कर सरकार बहादुर उड़नछू हो गए.कांग्रेसी राज में भी इसी तरह का नाटक हुआ था.
सत्ता की इस चालबाजी से साफ़ है कि गैरसैंण तो सिर्फ लोगों को भरमाने के लिए ही सत्ता पहुँचती है,दिल उसका देहरादून में ही बसता है.इसलिए यह लड़ाई तो लड़नी ही पड़ेगी..बहुत देर तक और बहुत दूर तक लड़नी पड़ेगी.मालसी की अस्थायी जेल में उत्तराखंड आन्दोलन के जमाने में लिखा भाई निरंजन सुयाल जी का गीत-“लड़ना है भाई ये तो लम्बी लड़ाई है/जीतने के वास्ते मशाल तो जलाई है” गाते हुए हम पहुंचे.नारे लगाने से भर्राए गले और वैसे भी बहुत सुरीला न होने के चलते,गीत भी नारों की तरह ही गाया जा रहा था.लेकिन गीत की,उसके लड़ने और जीतने का आह्वान करने वाले बोलों की ताकत थी कि एक एस.डी.एम. गीत को मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगे : एक कर्मचारी ने आ कर कहा-आपने शरीर के रोम-रोम में झुरझुरी पैदा कर दी ! यही आज का प्राप्य है और आगे की उम्मीद भी ,,,,,,,,,,,,

क्रांति भट्ट ने भी अपने फेसबुक पर लिखी है अपनी पीड़ा
Kranti Bhatt
8 hrs ·
* सात दिन का किया था ” करार ”
दो दिन में ही ” भरारी से फरार ” हो गयी सियासत ।
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* यूं तो उत्तराखंड विधान सभा का शीतकालीन सत्र गैरसैण भरारी सैण में सात दिन चलने का करार किया गया था । पर “वाह री सियासत ! । दो दिन भी ” भरारी में टिक न सकी और फरार हो गयी । ”
गैरसैण भरारी सैण , पहाड का दर्द . उत्तराखंड के शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बनायेंगे . हाय कौन कायल न हो जाय , उत्तराखंड की इस मासूम सियासती अदा पर । कत्ल भी कर दिया और मरहम की तश्तरी से लेकर भी हाजिर ।
किसे ” मुज़रिम ” और किसे ” मुंसिफ ” समझे । उत्तराखंड की सियासत में। गैरसैण भरारी सैण को राजधानी बनाने के मामलें ” क्या इधर वाले , क्या उधर वाले . दोनो बडे दलों की ” सियासती अदा एक सी है ।
18 वें साल में चल रहे उत्तराखंड राज्य का ” इस टीन ऐज ” में फिसल जाने का यदि कोई अकेला दोषी है तो वह ईमानदार नेतृत्व का अकाल ।
पहाड़ के राज्य की राजधानी ” पहाड़ में होनी चाहिए ” । पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी पहाड़ के काम आये । हमने नेताओं के मुंह से आज तक यही सुना । प्रवृत्ति वश भावुक . सीधे सादे और संवेदनशील पहाड़ के लोगों ने ” राजनीति के उस्तादों ” और उनके दलों के इस ” जोशीले भाषण पर यकीन किया। और अपनी व राज्य की किस्मत इनके हाथों से बनने पर यकीन करते भरोसे को वोट के रुप में इन्हें सोंप दिया । पर हम ” लाटे पहाड़ी ” समझे ही नहीं कि ” हमारे बीच से निकले ” चकडैतों ” और राजनीति के चकडैत मंच ” दलों ने हमारी उम्मीदों के साथ किस कदर खेल अब तक खेला है । और तय है कि यह खेला आगे भी जारी रहेगा ।
गैरसैण भरारीसैण में ” सपनों की राजधानी ” का यह सातवां आयोजन हुआ । जो ” कडवे प्रहसन से कुछ नहीं । शीतकालीन सत्र सात दिनों तक आयोजित करने का करार हुआ था । पर ” दो दिनों में ही जिस तरह भरारी से शातिर सियासत फरार हो गयी ” वह दिल पर प्रहार कर गयी । ” मोटे और मजबूत और बेशर्म कलेजा रखने वाली सियासत की आंखों में पानी नहीं बेहयायी होती है । इसलिये तय है कि अपनी इस अदा पर उसे अफसोस नहीं उपलब्धि नजर आयी हो । पर संवेदनशील लोगों का मन और सपने सियासत की इस चकडैती पर खूब टूटा है ।
गैरसेण भरारी सैण में सियासत का सातवां आयोजन हुआ । पहला गैरसेण में हुई कैबिनेट का था । सोचा ” कुछ ठोस तोहफा राज्य को मिलेगा । फिर गैरसैण में एक भब्य आयोजन हुआ । विधान सभा भवन शिलन्यास का । तमाम नेता आये । उमड उमड कर पहाड़ की जनता भी इस उम्मीद के साथ और आंखों में सपने लेकर आयी कि उत्तराखंड राज्य की राजधानी पहाड़ में ही बनेगी तो दर्द को समझने वाले लोग यहाँ आयेंगे । फिर गैरसैण के मैदान में ” टैंट लगाकर विधान सभा सत्र हुआ । लगा कि कितने भले हैं ये सियासत दां । कि ” टैंट लगाकर ही सही उत्तराखंड की बेहतर किस्मत लिखने के लिए जुटे है । फिर गैरसैण पालिटैक्नीक भवन में विधान सभा सत्र हुआ । उम्मीद थी कि जो टैंट वाले सत्र में न हुआ वो इस पक्की बिल्डिंग मे होगा । एक और विधान सभा सत्र भरारी सैण में बने भब्य विशाल आधे अधूरे भवन में गत वर्ष हुआ । लगा कि भले ही विधान सभा भवन अधूरा है पर यहाँ आयोजित सत्र से उत्तराखंड के सपनो की इबारत कुछ अच्छी लिखी जायेगी ।
इस बार शीतकालीन सत्र ” सात दिनों तक चलने का करार था । उत्तराखंड की जनता ने इन सात दिनों के लिए ” सात रंग के सपने ” देखे थे । पर वाह री सियासत ! दो दिन में ही भरारी से फरार ! भला कौन न मर न जाय तेरी इस कातिल अदा पर । किस तरह कत्ल किया सपनों का । उम्मीदों का । और ज़ुबां से उफ तक न निकली । और मुस्कुराते निकल गयी अपने अय्याशी के महलों के नर्म और गर्म बिस्तर पर । दो दिन भी बर्दाश्त न हुयी भरारी सैण की पहाड़ी की ठंड ।
किसे दोष दें इस ” चकडैती राजनीति के लिए ।
दिखने को भले ही जुदा जुदा दल हों। पर गैरसैण भरारी सैण राजधानी का मसला हो या अन्य वो सवाल जो उत्तराखंड के जमीन से तालुख़ रखते हैं । उसमें चाहे ” इधर वाले हों या उधर वाले , दोनों का “” डी एन ए ” एक जैसा नजर आता है ।” धूल उडाते थे गैरसेण भरारी सैण सियासत दां, और धूल झोंक कर फिर चले गये ।
“” और चेतू . मंगसीरू , फजीतू , सतेसुरी ( उत्तराखंड का आम जन मानस नाम प्रतीक ) ठगा सा रह गया । ” टप टप ” आंसू बहाते हुये । हाथ मलते हुये । भीगी पलकों और चीर चीर होते कलेजे की बीच ये गुनगुनाते हुये कि “” कारवां गुजर गया ….. और हम खडे खडे गुबार देखते रह गये ।
… भरारी सैण जैसी पवित्र और सुंदर जगह से ” सियासत के उत्सव के खत्म हो जाने के बाद सूने पडे धार से मन की ब्यथा कथा के साथ क्रांति भट्ट ।
कभी उत्सव में आये ” साहब लोगों और सियासत दां लोगों की इस्तेमाल की गयी ” शीशियों को देखता हूं और कभी उनके दो दिनों के हट्टास भरे कहकहे मुंह चिढाते कानों में सुनाई दे रहे हैं जो दो दिनों तक यहीं गूंजे थे । पर अब अकेला और सूना रह रह गया भरारी सैण में बना विशाल विधान सभा भवन । उम्मीद है कि कभी तो आयेंगे ” अच्छे दिन ” उसके भी । और ” लाटे उस पहाड़ी मनखी को भी आस लगी है कि शायद फिर न छले जांय । भरारी सैण के एक ढुंगें में बैठकर भोगे हुये दर्द और छलछलाती आंखों के पानी के साथ । मेरा दर्द

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