क्या है हरेला पर्व मनाने की मुख्य वजह, सतपाल महाराज ने बताया हरेला पर्व का महत्व

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क्या है हरेला पर्व मनाने की मुख्य वजह, सतपाल महाराज ने बताया हरेला पर्व का महत्व


देहरादून: आज से कुछ वर्ष पूर्व शायद ही हरेला त्यौहार पूरे उत्तराखंड में इतना प्रचलित रहा होगा जितना अब होने लगा है. इसकी एक मुख्य वजह है सभी लोगो का सोशल हो जाना. लोगो के सोशल हो जाने से कोई भी रीती रिवाज अब केवल एक ही शहर या एक ही मंडल तक सीमित नहीं रह जाता अपितु पूरे देश भर में ही नहीं बल्कि देश से बाहर भी प्रचलित हो जाता है. इससे ये फायदा तो निश्चित रूप से हुआ ही है कि जी भी अपने प्रान्त, गाँव, या परिवार वालो से दूर बैठे होते हैं वो आसानी से अपनी रीती परम्पराओ से जुड़े रहते हैं या ये कह लीजिये कि अपनी परम्पराओ के नजदीक होने का एहसास दिलाते हैं. और सही भी है कि अगर कोई परम्परा जो कि विश्व भर में एक नया आगाज़ कर सकती है वह केवल एक ही प्रान्त तक सीमित है तो उसके बारे में हर जगह जानकारी होनी ही चाहिए. भारत कृषि प्रधान देश रहा है और हरेला पर्व वृक्ष, हरियाली, खेती की ओर बढ़ावा देने वाला त्यौहार है.

इसी क्रम में आज प्रदेश के सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, लघु-सिंचाई, वर्षा जल संग्रहण, जलागम प्रबन्धन, भारत-नेपाल उत्तराखण्ड नदी परियोजनाएं, पर्यटन, तीर्थाटन, धार्मिक मेले एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय राजपुर रोड में हरेला मार्च को हरी झण्डी दिखाई, जिसमें विद्यालय के सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

मंत्री ने कहा हरेला शब्द का स्रोत हरियाली है। पूर्व में इस क्षेत्र का मुख्य कार्य कृषि होने के कारण इस पर्व का विशेष महत्व रहा है। हरेला पर्व को गढ़वाल में ‘‘हरियाली संक्रान्ति‘‘ कहा जाता है। उत्तराखण्ड में हरेला के त्यौहार को ‘‘वृक्षारोपण त्यौहार’’ के रूप में भी मानाया जाता है। श्रावण मास में होने वाले हरेला त्यौहार के दिन घर में हरेला पूजे जाने के उपरान्त एक-एक पेड़ या पौधा अनिवार्य रूप से लगाये जाने की भी परम्परा है। हरेला मार्च के दौरान छात्र-छात्राओं ने आम जनमानस को वृक्षा रोपण कराये जाने का संदेश दिया।

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