बदहाल किसान : आमदनी अठन्नी, कर्जा रुपय्या

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बदहाल किसान : आमदनी अठन्नी, कर्जा रुपय्या farmar food provider at risk
अरविंद शेखर
देहरादून उत्तराखंड में किसानों की खुदकुशी का दुखद सिलसिला शुरू होने के साथ ही प्रदेश में किसानों की बदहाली बहस के केंद्र में आ गई है। किसानों की तंगहाली का आलम यह है कि उनकी आमदनी अठन्नी है, मगर उन पर कर्ज रुपये से ज्यादा हो गया है। दुखद बात यह है कि अरसे से प्रदेश के किसान की सालाना आय न के बराबर बढ़ी है, मगर उन पर कर्ज उससे कई गुना अधिक है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षो में जहां किसान की आमदनी न के बराबर बढ़ी है, वहीं हर किसान पर डेढ़ लाख रुपये से ऊपर का कर्ज है।

वैसे तो सभी सरकारें प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय के पिछले समय में बढ़कर डेढ़ लाख रुपये से अधिक हो जाने पर अपनी पीठ ठोकती हैं लेकिन सरकार के अर्थ एवं संख्या निदेशालय के आंकड़े जो तस्वीर पेश कर रहे हैं, वे भयावह हैं। 2011-12 से लेकर 2014-15 के बीच जहां प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 101128 रुपये बढ़कर एक लाख 54 हजार 818 रुपये पहुंच गई, वहीं किसानों की दुर्दशा बताने के लिए ये आंकड़े काफी हैं कि इसी अवधि में 2011-12 से लेकर 2014-15 के बीच जहां फसल पर आधारित किसान की सालाना आय 62208 रुपये से बढ़कर महज 66403 यानी 4195 रुपये ही बढ़ी। वहीं फसल परआधारित राज्य की प्रति व्यक्ति सालाना आय इन्हीं पांच सालों में 6451 रुपये से बढ़ कर 6886 रुपये पहुंची यानी पांच साल इसमें महज 435 रुपये की ही बढ़ोतरी हुई है।

प्रदेश सरकार ने हालांकि किसानों को राहत देने के लिए दो फीसद ब्याज दर पर एक लाख रुपये तक का सस्ता ऋण देने की घोषणा की है। लेकिन किसानों के कर्ज की उनकी आय से तुलना करें तो साफ नजर आता है कि आखिर किसान किस दुष्चक्र में फंसकर खुदकुशी कर रहे हैं। अभी हाल में राज्य विधानसभा में वित्त मंत्री प्रकाश पंत की ओर से पेश आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश के कर्ज लेने वाले हर किसान पर औसतन एक लाख 56 हजार 888 रुपये का ऋण है। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 699094 किसानों ने 10968 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। इस कर्ज का एक वर्ष का ब्याज ही 934.32 करोड़ है। यह तो केवल वह ऋण है जो किसानों ने सरकारी बैंकों या सहकारी संस्थाओं से लिया है। सूदखोरों से लिए कर्ज का हिसाब तो शायद ही किसी को पता हो। सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि 2003 से 2013 यानी 10 साल में राज्य के किसानों पर बकाया कर्ज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है।

2003 में 7.2 फीसद किसान की कर्ज के जाल में थे 2013 तक यह तादाद 38.27 फीसद पहुंच गई। देश के 11 पहाड़ी राज्यों में बकाया कर्ज वाले किसानों के औसत यानी 24.9 फीसद से यह कहीं ज्यादा है। किसानों से कर्ज वसूली को लेकर बैंकों पर वसूली का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में जाहिर है कि बैंक रिकवरी के लिए दबाव बढ़ाएंगे जो पहले से परेशानहाल किसानों की दिक्कत में और इजाफा करेगा। राज्यस्तरीय बैंकर्स समिति के आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2017 में कृषि में एनपीए 729 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। 31 मार्च, 2017 तक बैंकों ने 3638 किसानों का कुल 38 करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला है। कृषि में ही बैंक 31 मार्च, 2017 तक करीब 217 करोड़ रुपये का वसूली बाकी थी। जाहिर है एनपीए बढ़ने के साथ ही बैंकों पर रिकवरी का दबाव और बढ़ता जा रहा है जो किसानों का संकट और बढ़ाएगा।

प्रदेश में औद्यानिकी को मिलाकर कृषि विकास दर भी इस बात की तस्दीक कर रही है कि कृषि प्रदेश की सरकारों की प्राथमिकता में कभी नहीं रही। यही वजह है कि 2012-13 में प्रदेश में फसली विकास दर जहां 1.12 फीसद थी, वहीं 2013-14 में वह इतनी बुरी तरह गिरी कि ऋण 7.84 फीसद हो गई यानी नकारात्मक हो गई। 2014-15 में इसमें सुधार हुआ और वह 0.78 फीसद पहुंची और 2015-16 में 3.52 फीसद थी।

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