हम अपने बेटे को राजा की तरह पालेंगे Positive thoughts 

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देहरादून हम अपने बच्चे को राजा की तरह पालेंगे। लेकिन सबसे पहले हमें यह निश्चित करना होगा कि हमें बच्चे को मजबूत बनाना है अथवा कम्फर्ट देना है। हम बच्चे को कम्फर्ट तो दे देंगे लेकिन बिना कम्फर्ट के जीवन जीना नहीं सिखला पायेंगे। हमें बच्चों को हर परिस्थिति में रहने की आदत डालना होगा। बच्चों को ए0सी0 के साथ और बिना ए0सी0 के रहना सिखलाना होगा। बच्चे को हर तरह के वातावरण में और तरह-तरह के लोगों के साथ एडजेस्ट करना बताना होगा। हमें बच्चों को रिश्ता निभाने का तरीका बताना होगा। आज बच्चे रिश्ते का महत्व नहीं समझ रहे हैं। इसलिए बच्चे स्वयं को अकेला महसूस कर रहे हैं।
आज हम घर और स्कूल को आराम दायक बनाते जा रहे हैं। लेकिन अधिक आराम और सुविधा मिलने से हमें बिना कुछ किये मिलने की आदत पढ़ जाती है। यह आदत आगे चल कर हमें निराशा देती है। सुविधा और आराम से हम कमजोर होते हैं। इससे हमारी फ्लैक्सबिलिटी और एडजेस्ट करने की शक्ति घटती है। इससे हमारी इच्छा शक्ति भी घटती है।
आज हर पैरेंट का तकिया कलाम हो गया है कि हम अपने बेटे को राजा की तरह पालेंगे। बच्चों को राजा की तरह पालने का अर्थ है। बच्चों को अधिक कम्फर्ट देना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ बच्चों में राज्य करने का गुण पैदा करने का है। राजा वह है जो अपने मन पर राज्य करे। राजा वह है जो खुद से खुद कहना मनवा ले। राजा वह है जिसका स्वयं पर अनुशासन है। बिना अनुशासन के शासन सम्भव नहीं है। प्राचीन काल में राजा का बच्चा राज भवन के अराम सुखः सुविधा को छोड़कर गुरूकुल में पड़ता था। राजकुमार गुरूकुल लकड़िया बिन कर खान-पान की व्यवस्था करता था। राजा का बच्चा अपना काम स्वयं करता था। क्योंकि राजा की बच्चे को आगे चल कर राज्य करना होता था। जो व्यक्ति अपने आदतों का गुलाम होगा। उसे राज्य करना नहीं आ सकता है।

हमारी इच्छा होती है कि हमें जितना कुछ मिला है, उससे अधिक अपने बच्चे को दे दें। लेकिन हमें भौतिक चीजों के खान-पान पर स्वयं की तुलना में मानसिक और भावनात्मक शक्ति बच्चे को देना चाहिए। क्योंकि भौतिक सुविधा बच्चे को कमजोर करेगी। जबकि मानसिक और भावनात्मक शक्ति बच्चे में आन्तरिक शक्ति का विकास करेगी। भौतिक शक्ति हमें दूसरों पर निर्भर रहना सिखाती है। भौतिक सुखः सुविधा हमारे अन्दर एडिक्सन पैदा करती है।

अपने बच्चों से प्यार करना सही है। लेकिन बच्चांे को कवच में डालकर रखना सही नहीं है। हम अपने बच्चों को कोई तकलीफ नहीं देना चाहते हैं। लेकिन तकलीफ के बिना आराम एवं सुखः सुविधा से पला बडा बच्चा जब इस दुनियां में आता है तो अपने को एडजेस्ट नहीं कर पाता है। वह बच्चा दुनियां की चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ रहता है। इसलिए हमें बच्चे में सामाजिक एवं भावनात्मक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। इसीलिए लोग कहते हैं कि हम इतने साफ-सुधर वातावरण में पले बडे हैं कि इस शहर का वातावरण हमें सूट नहीं करता है।

आज हम बच्चों की हर फरमाईस करते हैं। बच्चों को किसी बात के लिए ना नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन जब यह बच्चा बाहर की दुनियां में पहुचेगा। तब बच्चे को बहुत सी जरूरत ना सुनने को मिलेगा। यह समस्या बच्चे को रिश्ते और कैरियर में देखने को मिलेगा। बच्चे को ना सुनने की आदत है। इसलिए बच्चे को हर बात में गुस्सा आ जाता है। बच्चे को गुस्सा आ जाता है। किसी व्यक्ति को गुस्सा तभी आता है। जब उस व्यक्ति की परिभाषा के अनुसार लोगा नहीं चलेंगे। अथवा उस व्यक्ति की परिभाषा के अनुसार परिस्थितियां नहीं होंगी। बच्चे को गुस्सा आ जाता है। क्योंकि जैसा बच्चा चाह रहा है, वैसा नहीं हो रहा है अथवा जैसा बच्चा नहीं चाह रहा है वैसा ही हो रहा है।
हम बच्चे को वह सब कुछ देना चाहते हैं जो बच्चे चाहता है। लेकिन दुनियां बच्चों को वह नहीं देगी जो बच्चा चाहता है। हमें क्या चाहिए और हमारी क्या आवश्यकता है, इसकी पहचान करनी जरूरी है। पच्चीस प्रतिशत हमें चाहिए लेकिन हमारी आवश्यकता सौ प्रतिशत है।

स्वामी विवेकानन्द की पहचान युवाशक्ति के रूप मे होती है। इनके अनुसार हमारे भीतर अपार शक्ति सामथ्र्य है। हमें स्वयं को पहचानने की जरूरत है। स्वयं की ताकत की पहचान से हमारा आत्म विश्वास विकसित होता है।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार एकाग्रता का अर्थ एक विचार पर चलना है। एक विचार को ले लें और इस एक विचार को अपना एक जीवन बना लें। उसके बारे में सोचें, उसे विजुअलाइज और उसके सपने देखें। उस विचार को जीवन में उतार लें। अपने दिमाग मांसपेशियों, नसों और शरीर के प्रत्येक हिस्से में उस विचार को भर दें और अन्य सभी विचार छोड़ दें।
एकाग्रता का उदाहारण विश्वनाथन आनन्द के आँखों में देखा जा सकता है। वह सहजता और ध्यानस्थ बैठे होते हैं। उनकी आँखें ईधर-उधर नहीं भटकती रहती थी। अर्जुन की तरह उनकी आँखें अपनी टारगेट पर फिक्स रहती थी।
जीवन में चुनौतियाँ आती ही हैं। इस चुनौती के दबाव में स्कूली बच्चा नशा करने लगता है। नशा अंधेरी गली में ले जाता है। विनाश के मोड़ पर ला खड़ा कर देता है। इसका थ्री डी प्रभाव होता है। डार्कनेश, डिस्ट्रक्सन और डिवास्टेशन। लड़के देखी-देखा पीयर, प्रेसर से भी नशा करने लगते हैं। बच्चे इसे स्टाईल मान लेते हैं। दोस्तों के बीच में रह कर बच्चे के भीतर नहीं करने की हिम्मत होनी चाहिए। यह हिम्मत बच्चे के भीतर आत्मविश्वास से ही होगा।
बच्चों को अपने पास आने का अवसर दें। यदि आपके साथ खुलेंगे तब आपको पता चलता रहे कि बच्चे क्या कर रहे हैं। बच्चे में बुरी आदत अचानक नहीं आती है। बच्चे में बुरी आदत धीरे-धीरे शुरू होती है। हमें बारीकी से इस बात को वाच करना चाहिए। शुरूआत में परिस्थिति को आसानी से सम्भाला जा सकता है।
कहा जाता है पाँच वर्ष तक की आयु तक के बच्चे को दूलार एवं प्रेम दें। दस वर्ष तक की आयु को डिसिप्लिन में रखें और अठारह वर्ष की आयु के बच्चे को मित्र बना लें। पेरेंटिंग में माँ का बहुत बड़ा रोल होता है। समझदार माँ रूठ कर बच्चे से एक दिन बात न करे तो यह बच्चे के लिए बहुत बड़ी सजा होती है। बच्चे को समय-समय पर अपना बहुमूल्य समय दें।
बच्चा किसी परीक्षा को अपने जीवन की बहुत बड़ी घटना मानता है उसे लगता है कि यदि वह पास नहीं हुआ सारी दुनियां डूब जायेगी। जबकि वास्तविकता यह नहीं है। हमारी हर घड़ी परीक्षा की है। इसलिए कभी तनाव नहीं पालन चाहिए। केवल अच्छा परिणाम लाने का पक्का इरादा होना चाहिए। कोई परीक्षा आपके पूरे जीवन की कसौटी नही बन सकती है।
पेरेंट दूसरे बच्चे से अपने बच्चे की तुलना करते हैं। यह तुलना बच्चे के अन्दर प्रेशर पैदा कर देता है। हम चाहते हैं बच्चा टाॅप कर जाये और हमारा नाम रोशन हो जाये। हम बच्चे को माध्यम बना कर अपना नाम रोशन करने में लगे हैं।
संकल्प और प्रयास से कार्य सिद्ध होता है। हर दिन एक नया विचार पैदा करने हर दिन एक नयी इच्छा पैदा करने और हर दिन एक नया संकल्प करने उस संकल्प की बाल मृत्यु हो जाती है। और हम जहाँ रहते हैं वही खड़े रह जाते हैं। इसलिए इच्छायें स्थिर होनी चाहिए। जब इच्छाए स्थित होंगी तभी वह संकल्प बनेगा। संकल्प के साथ पुरूषार्थ जोड़ने पर संकल्प सिद्धी हो जाती है। रोज हम अपनी कसौटी पर अपने को कसें। दूसरों की कसौटी पर अपने को न कसें। हम रोज अपनी परीक्षा लें। हम देखें की कल हम कहा थे और आज कहा हैं।
बच्चों को अपने मार्ग दर्शक स्वयं बनने दें। आत्म दीप बनें। अपना दीपक स्वयं बनें। अपने भीतर के प्रकाश को पहचानें। अच्छा बैटसमैंन सामने से आने वाली गेंद पर ही अपना ध्यान केन्द्रीत करता है। वह न तो पिछली बाॅल के बारे में सोचता है और न अगली बाल के बारे में सोचता है। न पूरे मैच के बारे में सोचता है। अच्छा बैट्समैंन न तो यह सोचता है कि मैं पिछली बार शून्य पर आउट हुआ था और न यह सोचता है कि हम पूरा सीरीज जीतेंगे। जीतने का एक ही उपाय है वर्तमान से जोड़ के चलें।
अपेक्षाओं के बोझ के तले नहीं दबना चाहिए। हमें स्वयं अपना भविष्य बनाना है। हम स्वयं अपना लक्ष्य निर्धारित करें। और स्वतंत्र मन से स्वतंत्र सामर्थ से स्वतंत्र रूप में सोचें।

मनोज कुमार श्रीवास्तव
सहायक निदेशक, सूचना
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