कांग्रेस के ‘प्रीतम’ में है ‘वो’ करिश्मा ?

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कांग्रेस के ‘प्रीतम’ में है ‘वो’ करिश्मा ? congress uttarakhand preetam magic poltical ground कांग्रेस के 'प्रीतम' में है 'वो' करिश्मा ?
योगेश भट्ट
देहरादून विधानसभा चुनाव में करारी हार के बावजूद प्रदेश में हाशिए पर पहुंच चुकी कांग्रेस का ‘मर्ज’ अभी बरकरार है। पार्टी के अंदरूनी कलह और गुटबाजी पर इस हार का कोई असर नहीं है। अलबत्ता नए मुखिया की ताजपोशी के बाद नए ‘गुट’ का आगाज होता जरूर नजर आ रहा है। कांग्रेस आज सिर्फ “मैं रहूँ ना रहूँ, तुझे रहने नहीं दूँगा” की सोच के चलते हाशिये पर है l पूरा कुनबा बिखर चुका है, संगठन नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है, आम कांग्रेसी उपेक्षित है हताश निराश है l सही मायनों में पार्टी के लिए तो आपतकाल है,हर कोई जानता है कि प्रदेश में कांग्रेस की इस दुर्गति के लिए अंतर्कलह और गुटबाजी अहम कारण रहे हैं। सामान्य कार्यकर्ताओं से लेकर पार्टी के बड़े नेता भी इसे स्वीकार करते हैं।सच तो यह है कि ऐसे में कांग्रेस को ‘करिश्माई’ नेतृत्व की दरकार है l

आज आम कांग्रेसी भी यह कहता नजर आता है कि पार्टी को इस दुर्गत तक पहुंचाने में हरीश और किशोर का हाथ हैl अब बदले हालात में हाईकमान का भी इन दोनों नेताओं से भरोसा उठ चुका है। फिलहाल कांग्रेस हाईकमान ने प्रीतम सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नया संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि विधानसभा में इंदिरा हृदयेश को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद से ही यह साफ हो गया था कि संगठन की कमान अब प्रीतम को ही सौंपी जाएगी। इसका सीधा कारण क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का वो पैमाना है, जिसे राजनैतिक दल आज भी राजनीति का आधार माने हुए हैं । इस लिहाज से हाईकमान के पास प्रीतम के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।

बहरहाल उनकी ताजपोशी कांग्रेस में नई इबारत लिखे जाने की उम्मीद के साथ की गई है। अब सवाल यह है कि प्रीतम वो करिश्मा दिखा पायेंगे ? नि:संदेह प्रीतम पुराने नेता हैं, सौम्य एवं व्यवहार कुशल हैं। उनकी एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि है। लेकिन इस सबके बावजूद जो जिम्मेदारी उन्हें मिली है, वो बेहद चुनौतीपूर्ण है। राज्य बनने के बाद लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीते प्रीतम अपने क्षेत्र के मजबूत नेता हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं कि चकराता में उनका एकक्षत्र राज है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यही उनकी सीमा भी है। दो बार कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद शायद ही उन्होंने पूरे प्रदेश को दौरा किया हो, संगठन का भी उनका अनुभव कम ही है ।

अब प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनके सामने बड़ी चुनौती होगी कि वे दायरा बढ़ाकर पूरे प्रदेश में अपनी स्वीकार्यता और पकड़ बढ़ाएं। दूसरी चुनौती पार्टी को एकजुट मजबूत करना और ‘कुनबा’ बदाने की है। फिलवक्त पार्टी हाशिए पर होने के बावजूद भी हरीश गुट और किशोर गुट के अलावा भी कई अन्य गुटों में बंटी है। इंदिरा हृदयेश, नवप्रभात, हीरा सिंह बिष्ट, प्रकाश जोशी समेत कई दिग्गज ऐसे हैं, जिनका अपना अलग वजूद है। इन सबको साथ लेकर चलना और पार्टी को मजबूत करना प्रीतम की सांगठनिक क्षमताओं पर ही निर्भर करेगा। इसी के साथ एक बड़ा सवाल बदले हालात में संगठन चलाने के लिए संसाधनों का भी होगा l

इसमें कोई दोराय नहीं कि मौजूदा हालात उनके लिए कांटों का ताज सरीखे हैं। उनकी ताजपोशी के वक्त जो जश्न का माहौल दिखा उसे शक्ति प्रदर्शन कहा जाए या परिवर्तन की खुशी, जो भी हो सवाल पहले दिन से ही उठने लगे हैं। क्योंकि इतनी बड़ी हार के बाद कांग्रेस के लिए यह वक्त किसी जश्न का नहीं, बल्कि मूर्छा तोड़ने का है। सियासत के लिहाज से कहें तो फिलहाल यह जश्न कांग्रेस में एक ‘नए गुट’ के आगाज का संकेत दे रहा है, करिश्मे की उम्मीद तो अभी बाकी है l सियासत में चलने वाली अंतर्कलह आने वाले दिनों में जब और खुलकर सामने आयेगी , तब प्रीतम की नेतृत्व क्षमता का असल इम्तिहान भी होगा।

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