यौन शोषण मामले पर कोर्ट में पलटी महिला, खंड विकास अधिकारी बरी

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यौन शोषण मामले पर कोर्ट में पलटी महिला, खंड विकास अधिकारी बरी Bagehwar Bdo Case Court Rape Case News यौन शोषण मामले पर कोर्ट में पलटी महिला, खंड विकास अधिकारी बरी महिला अपने ऊपर लगाए गए आरोपो से मुकर गयी यही नहीं उसने यौन शोषण और मानसिक प्रताड़ना के मामले को लेकर कोर्ट में अपने बयानों को होने से भी इंकार कर दिया उत्तराखंड में इस तरह के मामलो को लेकर सामाजिक जीवन में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर दिए जाने के बाद अपना ईमान तक गिरवी रख कर कोर्ट जैसी जगह पर पलट जाना जहा कानून और कोर्ट का समय बर्बाद करना है वही इस तरह के मामलो में लाभ के लिए ऐसा किया जाना प्रतीत होता है।

बागेश्वर दो साल पहले हाईप्रोफाइल यौन शोषण मामला जो बना था सुर्खी

बागेश्वर दो साल पहले हाईप्रोफाइल यौन शोषण और मानसिक प्रताड़ना के मामले में न्यायालय ने खंड विकास अधिकारी रमेश चंद्र को बरी कर, आरोप लगाने वाली महिला ग्राम पंचायत अधिकारी को झूठे साक्ष्य गढ़ने का आरोपी मानकर उसके खिलाफ कार्रवाई करने की संस्तुति की है। न्यायालय ने विवेचना पर भी तल्ख टिप्पणी की है।जिसके कारण दो साल तक मानसिक रूप से रमेश परेशान रहा है मामले पर आरोप लगाने वाली महिला कोर्ट में अपने दिए गए बयान से पलट गयी है जिसके कारण रमेश कोर्ट से बरी हुआ है।

दरअसल, 14 मार्च 2015 को द्वाराहाट में तैनात महिला ग्राम पंचायत अधिकारी ने खंड विकास अधिकारी रमेश चंद्र पर यौन शोषण और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए ब्लॉक परिसर में जहरीले पदार्थ का सेवन कर लिया था। इस हाईप्रोफाइल मामले ने राज्य के ग्राम पंचायत अधिकारियों को हड़ताल पर धकेल दिया था। इतना ही नही मामला विधानसभा में भी जोर-शोर से उठा था।

महिला के पति की शिकायत पर लिखा था मुकदमा

इस मामले में कथित रूप से पीड़ित ग्राम पंचायत अधिकारी के पति धीरेंद्र सिंह की प्राथमिकी पर बीडीओ रमेश चंद्र को जेल भी भेजा गया था। अपर सत्र न्यायाधीश अशोक कुमार ने 26 अगस्त को इस चर्चित केस पर अपना फैसला सुनाकर रमेश चंद्र को दोष मुक्त करार दिया। साथ ही ग्राम पंचायत अधिकारी (महिला) के इस घटना से ही मुकर जाने पर फटकार लगाई है। फैसले में कहा गया है कि पीड़ित ने 164 के तहत दिए गए बयानों को अपना मानने से इंकार कर देने से अभियुक्त को बचाने या अनुचित लाभ प्राप्त करने की नीयत से पक्षद्रोह किया है।

इसे अत्यंत आपत्तिजनक और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए अपर सत्र न्यायाधीश ने अभियुक्त को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ने का दोषी मान उसके विरुद्ध कार्रवाई करने की संस्तुति की है। इसके लिए अपर सत्र न्यायाधीश ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट के मिश्री लाल बनाम मध्यप्रदेश सरकार के फैसले का हवाला दिया गया है। अपर सत्र न्यायाधीश ने विवेचना अधिकारी की विवेचना पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि चिकित्सक द्वारा मेडिकल परीक्षण के दौरान लिए गए नमूनों की विधि विज्ञान प्रयोगशाला में भेजकर जांच नही कराई गई।

इस मामले को लेकर कानून की उस पुलिस ने अपना क़ानूनी पक्ष अदालत में मजबूत नहीं किया जिसके कारण इस मामले पर पुलिस को भी अपने ही मुकदमे में जो रिपोर्ट कोर्ट में लगायी गयी उसमे आरोपी बरी हो गया एक तरफ जहा महिला वर्ग की शिकायत पर तुरत मुकदमा दर्ज़ किये जाने के लिए हमारे देश में कई तरह के कानूनों को बनाया जा रहा है वही इस तरह की महिलाओं के कारण समाज में गलत सन्देश जाता हुआ नज़र आ रहा है। जिस महिला का अपना कोई सामाजिक जीवन नहीं होता वही इस तरह के मामलो पर अपना ईमान बाजार में गिरवी रख देती है।

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