प्रशासनिक सुधार है प्रदेश की ‘पहली’ जरूरत

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प्रशासनिक सुधार है प्रदेश की ‘पहली’ जरूरत 
देहरादून प्रदेश में नई सरकार पन्द्रह दिन बीतने के बावजूद भी फिलवक्त ‘हनीमून’ पीरियड में ही नजर आ रही है। अगले पांच सालों के लिए सरकार का रोडमैप और प्राथमिकताएं क्या होंगी, यह अभी सामने नहीं आ पाया है। उम्मीद की जा रही थी कि नई सरकार पहले दिन से ही नई कार्य संस्कृति के साथ मैदान में उतरेगी जाएगी। दरअसल इतने सालों में प्रदेश की बदहाली का जो रोना रोया जाता रहा है, उसके पीछे एक बड़ा कारण कार्य संस्कृति रही है। बीते डेढ दशक में प्रदेश ने कार्य संस्कृति में गिरावट का जो दंश झेला है, उसके चलते ही प्रदेश की आज यह हालत है।हालत ये हैं कि जिलों में जो काम डीएम को करने चाहिए वो सीम कर रहे हैं, सीएम के जनता दरबार में आने वाली अर्जियां इसकी गवाह हैं । नौकरशाहों के हाल यह हैं कि एक नौकरशाह का एक महकमे से ‘पेट’ नहीं भरता l हर किसी को मंत्रियो की तर्ज पर भारी भरकम पोर्टफोलियो की दरकार हैl नतीजा एक एक अफसर के पास कई विभागों की एकमुश्त जिम्मेदारी है। हाल ही में कद्दावर नेता और सरकार में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने एक बड़ा अहम मुद्दा उठाया कि ‘एक मंत्री’ का ‘एक सचिव’ होना चाहिए। यानी मंत्री के पास जितने भी विभाग हैं, उन सभी विभागों का सचिव एक ही अधिकारी होना चाहिए। प्रदेश में मंत्रियों और नौकरशाहों के बीच तालमेल की मौजूदा स्थिति की बात करें, तो स्थिति यह है कि एक सचिव चार-चार मंत्रियों को एक साथ देख रहा है। इसके चलते सचिव साहब की एक टांग यहां तो एक वहां होती है। साथ ही उन्हें ‘सहूलियत’ के हिसाब से काम करने का मौका भी मिल जाता है, जिसका खामियाजा अंतत: प्रदेश की जनता को ही उठाना पड़ता है। इस लिहाज से देखें तो महाराज ने जो मुद्दा उठाया है वह प्रशासनिक सुधार की दृष्ठि से बेहद अहम है। आज प्रदेश में हालत यह है कि जो अधिकारी किसी विभाग का अध्यक्ष है, वही अधिकारी शासन में उस विभाग का सचिव या अपर सचिव भी है। यानी उस विभाग से संबंधित योजनाएं बनाने,मंजूरी देने और अमल कराने का अधिकार एक ही व्यक्ति के पास है। प्रशासनिक अराजकता का इससे बड़ा उदाहरण और भी कोई हो सकता है भला? प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता और अव्यवस्थाएं इस कदर कदर हावी हैं कि, कहने को तो अधिकारी काम के बोझ से दबे हैं, मगर असलियत में काम का यह बोझ खालिस दिखावा है। बीते डेढ दशक में प्रदेश की नौकरशाही एक भी ऐसी योजना का ड्राफ्ट तैयार कर केंद्र को नहीं भेज सकी, जो प्रदेश के मिजाज और जरूरत के अनुकूल हो। यही वजह है कि इस वक्त प्रदेश की सबसे बड़ी जरूरत प्रशासनिक सुधार है। सरकारें सुधार की बातें तो करती हैं, लेकिन सुधार नहीं करतीं। दुख की बात यह है कि यहां का प्रशासनिक तंत्र सुधार के लिए कभी भी तैयार नहीं होता। यदि होता तो प्रशासनिक आयोग की रिपोर्ट दस साल बाद भी सचिवालय के किसी कोने में धूल नहीं फांक रही होती। प्रशासनिक सुधार आयोग की इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए हैं, जिन पर अमल किया जाता तो प्रशासनिक सुधार की दिशा में हमारा प्रदेश काफी आगे निकल चुका होता। समान प्रकृति वाले अलग-अलग विभागों का एकीकरण हो चुका होता। एक अधिकारी को अलग-अलग विभागों से मिल रही सुविधाएं समाप्त हो चुकी होती। सरकारी कामकाज में पार्दर्शिता होती, सिस्टम हाईटेक हो गया होता l राज्य के प्रति प्रतिबद्धता और जवाबदेही बढ़ती l रिटायरमेंट के बाद होने वाला अफसरों का पुनर्वास बंद हो चुका होता, आदि-आदि। लेकिन अभी तक ऐसा हो नहीं सका है। अब नई सरकार से जब इसकी उम्मीद की जा रही है तो कहा जा रहा है कि सरकार को समय दिया जाना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि समय आखिर किस लिए दिया जाना चाहिए? क्या जिस दल, भाजपा की वर्तमान में सरकार है, वह पूर्व में सत्ता में नहीं रह चुकी? क्या उसे प्रदेश की जरूरतों की जानकारी नहीं? क्या उसे मालूम नहीं कि प्रदेश को किस तरह से सुधारों की जरूरत है? आज प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता इस कदर बढ चुकी है कि एक जन-प्रतिनिधि और सरकार में मंत्री के सवाल पर एक जिलाधिकारी जनता से फीडबैक लेने की बात कहने लगता है। जरा सोचिए, जब एक मंत्री के सवाल का जवाब देते हुए कोई अधिकारी इतनी बड़ी हिम्मत दिखा रहा हो तो प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता की स्थित क्या होगी? सरकार के लिए और प्रदेश के लिए भी यह बेहतर होगा कि सरकार इस सच्चाई को समझे और प्रशासनिक सुधार की चुनौती को न केवल स्वीकार करे, बल्कि दृढ इच्छाशक्ति दिखाते हुए कार्य संस्कृति में सुधार लाकर दिखाए।
योगेश भट्ट पत्रकार के फेस बुक वाल से साभार

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