उत्तराखण्ड सूचना आयोग के 90 प्रतिशत आदेश हाईकोर्ट ने किये खारिज

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देहरादून उत्तराखण्ड सूचना आयोग के पैनल्टी, विभागीय कार्यवाही तथा मुआवजे के अधिकतर आदेश उत्तराखंड उच्च न्यायालय में टिक नहीं पाये। अप्रैल 2015 से लेकर सितम्बर 2015 तक निर्णीत मामलों में केवल 2 अर्थदण्ड के आदेशों को छोड़कर इन रिटों में चुनौती दिये गये शेष सभी पैनल्टी, विभागीय कार्यवाही तथा मुआवजे के आदेशों को खारिज करके विभिन्न लोक सूचना अधिकारियों को हाईकोर्ट ने राहत प्रदान की है। सूचना अधिकार व कानून के जानकार नदीम उद्दीन के शोध पत्र से यह खुलासा हुआ है।
सूचना अधिकार व कानून के जानकार तथा 38 कानूनी पुस्तकों के लेखक, एल-एल.एम. तथा नेट अहर्ता प्राप्त नदीम उद्दीन के शोध पत्र के अनुसार उत्तराखंड सूचना आयोग के 19 निर्णयों व आदेशों के विरूद्ध मा0 उत्तराखंड उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिकाओं को अप्रैल 2015 से सितम्बर 2015 तक निर्णीत किया गया है। केवल दो रिट याचिकाओं को अस्वीकार करके मा0 उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड सूचना आयोग के पैनल्टी आदेशों की पुष्टि की है। लेकिन 17 रिटों को स्वीकार करके उत्तराखंड सूचना आयोग के आदेशों को खारिज कर दिया। इन रिटों में 16 अर्थदण्ड (पैनल्टी), 4 विभागीय कार्यवाही की सिफारिश तथा 2 मुआवजे के उत्तराखण्ड सूचना आयोग के आदेशों को चुनौती दी गयी थी। केवल 2 अर्थदण्ड के आदेशों को छोडकर शेष सभी आदेशों को गलत मानते हुये मा. उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया।
उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने लोक सूचना अधिकारी नरेन्द्र कुमार की दो रिटों को खारिज करके उनके विरूद्ध उत्तराखण्ड सूचना आयोग के पैनल्टी आदेशों की पुष्टि कर दी। इसके अतिरिक्त अप्रैल से सितम्बर 2015 तक की अवधि में निर्णीत उत्तराखण्ड सूचना आयोग व मुख्य सूचना आयुक्त के विरूद्ध दायर सभी रिटों को स्वीकार करके याचिका कर्ताओं को राहत दे दी है। इन निर्णयों में जिन लोक सूचना अधिकारियों के विरूद्ध उत्तराखंड सूचना आयोग के पैनल्टी आदेश निरस्त किये गये हैं उनमें डायरैक्टर जनरल, हैल्थ तथा प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, लोक सूचना अधिकारी दीवान सिंह नेगी, सदन लाल, श्रीमति मायावती ढकरियाल, भगवान प्रसाद घिल्डियाल, नगर निगम देहरादून के लो.सू.अ., अरविन्द कुमार लोहनी, पब्लिक अथोर्टी/प्रिंसपल सैक्रेटरी, मिस बीना भट्ट, बी. एस. चैहान, नामिशा भट्ट, पब्लिक अथोेर्टी सैक्रैटरी अर्बन डेबलपमेंट शामिल हैं।
श्री नदीम के शोधपत्र के अनुसार उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने जिन आधारों पर सूचना आयोग के आदेश निरस्त किये गये हैं उनमें धारा 20 के आधारों के अतिरिक्त अन्य आधारों पर पैनल्टी लगाना व विभागीय कार्यवाही की सिफारिश करना, सूचना उपलब्ध कराने में देरी के सही कारणों पर विचार न करना, मुआवजा सम्बंधी आदेशों में सूचना न देने से हुये नुकसान को स्पष्ट न किया जाना शामिल है।
श्री नदीम का यह शोधपत्र सभी निर्णयों के पूर्ण संदर्भों सहित फेस बुक के सूचना अधिकार ग्रुप तथा सूचना अधिकार कानून पेज पर भी जनहित में निःशुल्क उपलब्ध है। इस रिसर्च पेपर में दिये गये सुझावों में लोक सूचना अधिकारियोें को जागरूक करना ताकि वह सूचना देरी से देने या उपलब्ध न कराने का युक्तियुक्त कारण होने पर सूचना आयोग के नोटिस के उत्तर में प्रस्तुत कर सकें, सूचना आयोग द्वारा समय-समय पर उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के दिये गये निर्णयों का नियमित अध्ययन की व्यवस्था करना, सूचना अधिकार के सम्बन्ध में उच्च न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों का अध्ययन करके सूचना आयुक्तों के सही व गलत निर्णयों की ओर ध्यान आकर्षित कराना तथा उच्च न्यायालय के निर्णयों का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाना शामिल है।

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