जेब में 16 % फिर भी गुलजार रहा सन्डे बाजार

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जेब में 16 % फिर भी गुलजार रहा सन्डे बाजार
सुरेंद्र आर्य
देहरादून के दर्शन लाल चौक से सर्वे ऑफ़ इण्डिया तिराहे तक तक़रीबन सवा किलोमोटर लंबा लगने वाला सन्डे बाजारऔर साथ लगे इंदिरा मार्किट नोटबंदी के दूसरे रविवार हमेशा की तरह पूरे शवाब पर दिखा। भरपूर रौनक थी। सड़क पर निकलना आसान नहीं था। यह मेरे लिए एक चौकाने वाली बात थी। अपनी जिज्ञाषा को शांत करने के लिए मैंने एक सिरे से दूसरे कोने तक बाजार में घूम कर जायजा लिया। अकेले और परिवार या साथी के साथ खरीददारी करने पहुंचे लोग दुकानदारो से मोल -भाव काने में मशगूल दिखे।
बाजार में जूते -मोज़े , पेंट -शर्ट , गरम स्वेटर -जैकेट और पजामियों की खरीद सर्दियों के आगमन का एलान कर रही थी। वैसे यह कोई नयी बात नहीं है। ऐसा हर व्यक्ति करता है और बाजार तैयारी रखता है।इसमें अनूठी बात यह है कि जहां देश के मिडिया तंत्र का बड़ा भाग समाज के मध्य और कमजोर लोगो की , नोटबंदी से बढ़ी परेशानियों और मुसीबतो को जोर शोर से उभरने में जुटा है। अपने ही पैसे निकलने के लिए बैंको और एटीएम के आगे लंबी -लंबी लाइने दिखा रहा है। बताया जा रहा है कि जेब में पैसा न होने के कारण सामान्य लोगो का जीना दूभर हो गया है। उसके विपरीत यह रौनक कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही थी।
यह तो तय है कि घर की रोजमर्रा की जरूरतों का इंतज़ाम कर लेने के बाद ही लोग इन वस्तुओं की खरीददारी करने निकल होगा। इस बाबत मेरे साथी ने कुछ लोगो से बात की तो उत्तर भी चोकाने वाला था -ठीक है बैंक कम पैसे दे रहा है और एटीएम बंद पड़े हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारे पास पैसा नहीं है ? इतना पैसा तो घर और जेब में रहता ही है।
मेरे कौहतूल का विषय यही था कि 500 और 1000 रूपए के नोट बंद हो जाने के बाद करेंसी के न होने का जो रोना रोया जा रहा है उसका असर यहाँ क्यों नहीं दिखा ? बताया जा रहा है कि देश की प्रचलित मुद्रा (करेंसी ) का 84 प्रतिशत रद्द कर देने से सरे कारोबार ठप्प हो गए हैं। यह बात देश को भरोसा दिलाने वाली है कि देश की जनता महज 16 प्रतिशत प्रचलित करेंसी के साथसाथ भी अपने जीवन की गाडी चलाना जानती है। बाजार में सभी लोग 100 ,50 और 10 रूपए के नोटों के बूते ही खरीददारी कर रहे थे। और यह बाजार कोई धनाड्य व्यापारी नहीं सजाते ये सभी छोटे और घुमंतू दुकानदार हैं। इनके ग्राहक भी मॉल में जाने वाला संभ्रांत नागरिक नहीं अपितु निचले पायदानों पर खड़े लोग ही होते हैं।
मैं यह सभी पहलू सोचते -सोचते आत्म विभोर हो गया मुझे हर आदमी के आत्म विश्वास और जीवटता पर नाज़ हो आई। मैं मन ही मन उन्हें सलाम करता लिखने बैठ गया। वही बाज़ारो में लोगो का यही कहना था की उनके पास धन है इसी लिए बाजार में आये है लेकिन बैंको और एटीएम के अंदर लाइन में लगे लोगो को देख कर नहीं लगता की लोगो के पास धन नहीं कई लडकिया और महिलाये यही कहते नज़र आये की उनके पास बाज़ारो में खरीदारी करने के लिए पैसो की कोई कमी नहीं है

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