बाजीगरी कितनी भी पर अभेद्य है हरीश रावत का किला

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बाजीगरी कितनी भी पर अभेद्य है हरीश रावत का किला
रूपेश कुमार सिंह
ऊधम सिंह नगर। प्रिये पाठकों नव वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाएं। नये साल के आगाज के पहले सप्ताह में प्रदेश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी। इसके मध्यनजर राजनीतिक दल चुनावी समर के लिए ताल ठोंक चुके हैं। सरगर्मियां तेज हैं। सत्ता में मौजूद कांग्रेस जहां अपनी वापसी की जुगत में है, वहीं विपक्षी दल भाजपा कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए छटपटा रही है। कांग्रेस की वन मैन आर्मी के सामने भाजपा के सेनापतियों की लम्बी कतार है। पार्टी के भीतर नेताओं की भरमार से परेशान भाजपा के पास चार चार पूर्व मुख्यमंत्री होने के बावजूद 2017 में मुख्यमंत्री के लिए कोई चेहरा नहीं है। कांग्रेस हरीश रावत पर ही विश्वास जता चुकी है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के अनुसार हरदा अभी भी शिखर पर हैं।
एक फरवरी 2014 को राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के तौर पर हरीश रावत ने सरकार की कमान संभाली थी। संगठन और सरकार की पस्त हिम्मती, निराशा, विनाशकारी आपदा, चैतरफा असंतोष, विजय बहुगुणा समर्थकों के बगावती तेवर, हरक सिंह रावत और याशपाल आर्य की घोर नाराजगी के बीच बेहद ही नाजुक वक्त था जब हरीश रावत मुख्यमंत्री बने थे। शुरूआती दिनों में उनका आकलन कमजोर मुख्यमंत्री के रूप में हुआ। 16 साल की अल्प आयु के नवगठित उत्तराखण्ड के हिस्से 8-8 मुख्यमंत्रियों का बोझ कैसे बर्दाश्त करेगी जनता, यह भी अहम अवाल था। हिमालयी पृष्ठभूमि से पूर्णतः परिचित सीएम हरीश रावत राज्य में कुछ खास बेहतर करेंगे, ऐसी अपेक्षा उनके आलोचकों को भी थी। उम्मीद कहां तक पूरी हुई, इसका रिजल्ट तो चुनाव परिणाम से पता लगेगा। लेकिन राजनीति में चतुर और निपूर्ण हरदा ने संगठन और सरकार में अपने कद को जरूर शिखर तक पहुंचा दिया है। जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के दस कद्दावर नेताओं की बगावत को परास्त किया है, वो काबिल ए तारीफ है। इसलिए अब उनके लिए कहा जा रहा है कि ‘‘बाजीगरी कितनी भी लेकिन अभेद्य है हरीश रावत का किला।’’
विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत के पार्टी छोड़ने से प्रदेश में एक छत्र राज कर रहे हैं हरीश रावत। संगठन और सरकार में वो पहले पायदान पर हैं। मुख्य विरोधी सतपाल महाराज पहले ही भाजपा में चले गये, एक बड़ा रोड़ा हट गया। यशपाल आर्य अब मुखालफत करने की स्थिति में नहीं हैं। कैबिनेट में मजबूत ओहदे पर मंत्री इंदिरा हदयेश से संधि के तहत पहले ही रिश्ते सौहार्द हैं। इस तरह से कोई बड़ा सुर हरीश रावत के खिलाफ मैदान में नहीं है। सवाल उठता है कि जब हरीश रावत ने खुद को इतना मजबूत कर लिया है तो 2017 में उनकी वापसी होगी? उत्तराखण्ड की जनता कांग्रेस को वाॅक आॅवर देगी? जबर्दस्त अन्तर्विरोध में उलझी भाजपा ठोठ टक्कर दे पाएगी? नोटबंदी के बड़े फैसले का लाभ भाजपा को होगा? क्या कोई तीसरा विकल्प सामने आ पाएगा? इसके अलावा भी तमाम राजनीतिक सवाल हैं चुनाव के मध्यनजर। जिसका जवाब मतदाता के मत से तय होगा।
दरअसल उत्तराखण्ड की जनता की मंशा को जान पाना इतना आसान नहीं है। पिछले चुनावों के परिणाम अनुमान के विपरीत ही रहे हैं। 2002 के पहले आम चुनाव में उम्मीद थी कि राज्य बनाने का श्रेय भाजपा को मिलेगा, लेकिन कांग्रेस जीती और एन डी तिवारी मुख्यमंत्री बने। 2002 में कांग्रेस को 36, भाजपा को 19, बसपा को 7, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के 4 व 4 निर्दलीय विधायक चुने गये। फरवरी 2007 में हुए दूसरे चुनाव में पासा बदल गया। कांग्रेस जनादेश का सम्मान नहीं कर सकी। यह बात अलग है कि एनडी तिवारी ने विकास के कई कदम उठाए, लेकिन जनता की नजर में वो नाकाफी साबित हुए। 2007 में भाजपा को 35, कांग्रेस को 21, उक्रांद को 3, बसपा को 8 सीटें मिलीं। चुनाव नतीजे एक बार फिर चौंकाने वाले थे। रिटायर्ड मेजर भुवन चन्द्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा में विरोध के चलते रमेश पोखरियाल निशंक की ताजपोशी खण्डूरी की जगह हुई। केन्द्रीय नेतृत्व का यह फैसला गलत साबित हुआ। घोटालों के आरोप से घिरी निशंक सरकार से जनता का मोह भंग हो गया। 2012 के चुनाव से पहले खण्डूरी हैं जरूरी नारे के साथ पुनः भुवन चन्द्र खण्डूरी पर भाजपा ने भरोसा जताया। पूरी उम्मीद थी कि भाजपा की वापसी होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2012 में कांग्रेस को 32, भाजपा को 31 सीटें मिली। उक्रांद को एक, बसपा और निर्दलीयों को 3-3 सीटें हासिल हुईं। स्वयं खण्डूरी पार्टी के भीतरघात के चलते चुनाव हार गये। ऐसे में 2017 में हरीश रावत की वापसी होगी, इस पर संशय है। हालांकि भारी आन्तरिक कलह से जूझ रही भाजपा फिलहाल बेअसर नजर आ रही है। लेकिन चुनाव जीतने के लिए इतना ही काफी नहीं है सीएम साहब! आसमान की ओर बढ़ते अपने शिखर की बुनियाद को और मजबूत करना होगा। हरीश रावत के सामने जनता का विश्वास मत हासिल करना बड़ी चुनौती है।

सेनापतियों की भरमार परेशानी का सबब
ऊधम सिंह नगर। पार्टी के भीतर नेताओं की भरमार भी परशानी का सबब बन सकती है। इसकी ताजा मिसाल उत्तराखण्ड भाजपा का है। नेताओं की बहुतायत किस कदर असहाय बनाती है इसका एहसास भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व कर रहा है। ऐसी स्थिति में पार्टी के अन्दर भीतरघात की आशंका बढ़ जाती है। उत्तराखण्ड चुनाव भाजपा के लिए नाक का सवाल बन चुका है। चार पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा कांग्रेस से आये दस विधायकों को खपा पाना टेढ़ी खीर है। सतपाल महाराज भी भाजपा में बड़ा नाम हैं, उन्हें दरकिनार करके भी पार्टी का काम नहीं चलेगा। भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चन्द्र खण्डूरी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा चारों पूर्व मुख्यमंत्री हैं। हर किसी का सपना 2017 में मुख्यमंत्री बनने का है। ऐसे में मन और मत भेद लाजमी हैं। पिछले दिनों कांग्रेस से भाजपा में आये दस विधायक गढवाल में खासा असर रखते हैं। उनको भाजपा से टिकट मिलता है तो पूर्व के भाजपा नेता भी बगावत पर उतर सकते हैं। कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस पहले से ही मजबूत है। तराई की 23 सीटों में पिछली दफा भाजपा और कांग्रेस को दस-दस बराबर सीटें मिलीं थीं। ऐसे में भाजपा के दमदार नेता फिलहाल प्रचार से दूरी बनाये हुए हैं। जबकि हरीश रावत ताबड़तोड़ जनसभाएं कर रहे हैं।

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